नारी जननांग अर्थात कामांग और कामतृप्ति - Ayurveda : A Holistic approach to Health, age and Longevity

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Ayurveda : A Holistic approach to Health, age and Longevity

Ayurveda-A Natural Treatment System developed in India that has been passed on to humans from the God Dhanvantari, themselves who laid out instructions to maintain health as well as fighting illness through therapies, massages, herbal medicines, diet control, and exercise.

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Wednesday, October 4, 2017

नारी जननांग अर्थात कामांग और कामतृप्ति

 जैसा कि आप सभी जानते होंगे कि सम्पूर्ण प्रकृति एक विशिष्ठ प्रकार के बल से बँधी है जिसे कहते है आकृषण का बल और इस आकृषण का प्रकटीकरण है काम  जिससे सम्पूर्ण प्रकृति आवद्ध है और काम क्रिया के निस्पादन के लिए प्रकृति ने सभी जीवधारियों में ही नही अपितु सम्पूर्ण कायनात को अलग अलग अंग प्रदान किये हैं जिससे कि आकृषण पैदा हो। मानव शरीर को भी प्रकृति ने नर व नारी दो रुपों में प्रकट किया है और दोनों ही शरीरों में  कुछ अंग एक दूसरे से विल्कुल अलग बनाए हैं। है दोनों शरीर मानव के ही किन्तु दोनों में ही विविधता है।दोनों ही शरीर एक दूसरे से अलग अपूर्ण हैं और दोनों के मिलन से ही पूर्णता सम्भव है या ये कहें कि दोनों का मिलन ही नयी प्रकृति बना सकने में समर्थ है। आज हम मानव शरीर के उसी अंग नारी रुप के बारे में विस्तार से बताऐंगें।यहाँ यह जानना बहुत जरुरी है कि

नारी के शरीर में अनेकों कामांग है जो कामतृप्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

महिलाओं के स्तनों की शारीरिक रचना

स्तन पुरुषों और महिलाओं दोनों में  होते हैं। महिलाओं में स्तन एक विशेष संरचना होती है जो एक स्रावी अंग के रुप में दूध स्राव्रित करते हैं वही  द्वितीयक यौन अंग के रूप में कार्य करते हैं।

महिला के स्तन  छाती के अग्र भाग के एक बड़े हिस्से को घेरते हैं जो अश्रु-ग्रंथि के आकार के समान होते हैं यह कॉलर बोन (हंसली) से शुरू होकर पसली की हड्डियों (दूसरी पसली से लेकर छठी या सातवीं पसली तक) तक जाते हैं। क्षैतिज रूप से, यह ब्रेस्टबोन (उरोस्थि) के किनारों से शुरू होकर कांख (बगल) तक फैले होते हैं। स्तन का आधार  गोलाकार होता है और इसकी माप लगभग 10-12 सेंटीमीटर होती है, लेकिन स्तन

की आकृति और आकार परीवर्तनीय होता है।
जन्म का विकास भ्रूण जीवन के छ्ठे सप्ताह से प्रारंभ होता है। जन्म के समय, स्त्री और पुरूष दोनों के स्तन समान दिखते हैं। यौवन के दौरान लड़कियों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन (हार्मोन) के कारण स्तन का विकास होता है।
आमतौर पर महिलाओं में दोनों स्तनों असममित होते हैं। एक स्तन दूसरे स्तन की तुलना में छोटा/बड़ा, ऊपर/नीचे स्थित या आकर में भिन्न हो सकता है।
युवा महिलाएँ जिन्होंने ने बच्चे को जन्म नहीं दिया है, उनके स्तन आमतौर पर गोलार्द्ध आकार के होते हैं; जबकि जिन महिलाओं के बच्चे हैं उनके स्तन चौड़े और लटके हुए होते हैं; बुजुर्ग महिलाओं के स्तन का आयतन कम हो जाता है और वे कम सुदृढ़, समतल और ढीले हो जाते हैं। स्तन का वजन 150—225 ग्राम तक हो सकता है, जबकि स्तनपान कराने वाली महिलाओं के स्तन (दूध से भरे हुए) का वजन 500 ग्राम से अधिक हो सकता है। निपल (वक्षाग्र) का आकार भी महिला दर महिला भिन्न होता है।

स्तन की संरचना

स्तन में ग्रंथियाँ, पुष्टिकारी संयोजी ऊतक और वसा, स्नायुबंधन, रक्त वाहिकाएँ, नसों और लसीका प्रणाली होती हैं।
स्तन चारों ओर से वसा की परत (वसा ऊतकों) से घिरा होता है, जो स्तन को मुलायम बनाते हैं।

स्तन के तीन मुख्य भागों में निम्न शामिल हैं:

  • दूग्ध ग्रंथियाँ (ग्लैनडुला मैमेरिया)
  • छोटा वृत्तीय क्षेत्र (एरोला मैमेई)
  • निपल (वक्षाग्र) (पैपिला मैमेरिया)
दुग्ध ग्रंथियाँ (पिण्डिका) या लोबी ग्लैंडुएले मैमेरिया: पंद्रह से बीस पिण्डिकाएँ वृत्तीय आकार में व्यवस्थित होती हैं जो संयोजी ऊतकों और वसा ऊतकों (वसा तंतु) द्वारा निर्मित विभाजनों द्वारा पृथक होती हैं। ग्रंथियों का कार्य दूध का उत्पादन करना है।
प्रत्येक पिण्डिका की मुख्य धमनी को लैक्टिफेरस डक्ट (डक्टस लैक्टिफेरी) कहा जाता है और ये प्र्थक रूप से वक्षाग्र में खुलती हैं। लैक्टिफेरस डक्ट दूध को पिण्डिका से वक्षाग्र में ले जाती है।
अरिओला यह निपल के चारों ओर स्थित भूरे या गुलाबी रंग का वृत्तीय क्षेत्र होता है, जिसमें अनेक तेल ग्रंथियाँ होती हैं जो अरिओला और निपल (वक्षाग्र) को ल्यूब्रिकेटेड और संरक्षित रखने में सहायता करती हैं।
निपल (वक्षाग्र) स्तन के बीच स्थित उभरा हुआ हिस्सा होता है जिससे दूध बाहर आता है।
वसा और संयोजी ऊतक: यह स्तन की ग्रंथियों और धमनियों को भरते और आच्छादित करते हैं। इनका कार्य स्तनों को रक्षित करना और आकार देना है।
अस्थिबंध: यह संयोजी ऊतकों का अस्थि-बंधन होती हैं, जो त्वचा से शुरू होकर स्तन से होते हुए छाती की मांसपेशी तक जाती है और इसका कार्य स्तन को समर्थन देना है।
तंत्रिकाएँ: स्तन के हिस्से में अनेक महत्वपूर्ण तंत्रिकाएँ होती हैं, जिसमें छाती और बाहु क्षेत्र में स्थित तंत्रिकाएँ शामिल होती हैं। संवेदी तंत्रिकाएँ भी होती हैं जो छाती और काँख की त्वचा में उपस्थित होती हैं। ये कथित उत्तेजना के लिए जिम्मेदार होती हैं।
रक्त वाहिकाएँ: अनेक रक्त वाहिकाएँ होने के कारण स्तन में रक्त का संचलन बेहतर होता है।
स्तन की लसीका प्रणाली: लसीका वाहिकाएँ रक्त वाहिकाओं के समान पतली नलिकाएँ होती हैं। लसीका एक साफ पीले रंग का द्रव होता है जो शरीर के ऊतकों को साफ करता है और पूरे शरीर में संचरित होता है और इसमें पोषक तत्व, श्वेत रक्त कोशिकाएँ और एंटीबॉडी (रोग-प्रतिकारक) होते हैं। इन छोटी नलिकाओं द्वारा स्तन से लसीका को छोटी सेम के आकार की संरचनाओं में ले जाया जाता है जिन्हें लसिका ग्रंथि कहा जाता है। लसीका ग्रंथि में अनेक  लिम्फोसाइट होते हैं (एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकाएँ) और इनका कार्य बाहरी कणों और सूक्ष्मजीवों को फ़िल्टर करना है और यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा होता है।
स्तन में लसीका ग्रंथि के चार समूह होते हैं:
  • सुपराक्लैविकुलर ग्रंथि – कॉलर बोन (हंसली) के ऊपर स्थित होती है
  • इंफ्राक्लैविकुलर (या सबक्लैविकुलर) ग्रंथियाँ – कॉलर बोन (हंसली) के नीचे स्थित होती हैं
  • कांख ग्रंथि – बगल (कांख) में स्थित होती है।
  • आंतरिक स्तन ग्रंथि – छाती के अंदर, उरोस्थि (ब्रेस्टबोन/ उरास्थि) के पीछे स्थित होती है

स्तन के कार्य

स्तन का प्राथमिक कार्य शिशु को पिलाने के लिए दूध का उत्पादन, संग्रहण और उसे निर्मुक्त करना है। गर्भावस्था के दौरान, गर्भावस्था संबंधी हार्मोन द्वारा स्तन उभर जाते हैं और दूध का उत्पादन करने के लिए तैयार हो जाते हैं। प्रसव के बाद, महिलाओं के शारीर में हार्मोन बदलाव होते हैं जो दूध का उत्पादन करने के लिए दुग्ध ग्रंथियों को उत्तेजित करते हैं। धमनियों द्वारा दूध को ग्रंथि से निपल तक ले जाया जाता है। शिशु द्वारा निपल चूसने पर दूध निपल से स्रावित होता है।
स्तन द्वितीयक यौन अंग के रूप में भी कार्य करते हैं और महिलाओं को लैंगिक रूप से आकर्षित बनाने में भूमिका निभाते हैं।

स्त्री में कामांग (सेक्स संबधी अंग)- 

 मारी शरीर के अंग उसकी बनावट उसकी क्रिया विधि को समझ कर ही हम प्रकृति के बारे में समझ पाऐंगें कि आखिर ऐसा क्या होता है कि एक दूसरे से मिलन के लिए मानव के दोनों रुप तत्पर रहते है। 
नारी में कामांग दो प्रकार के होते हैं 

1- बाह्य स्त्री कामांग-

                 स्त्री के वाह्य कामांगों में  प्रमुख अंग है योनि व भगनासा
स्त्री के वाहरी अंगो के उपांगो में सबसे पहले आता है
योनि कपाट भग द्वार या योनिमुख- 
 यह  वड़े तथा छोटे ओष्ठों के बीच जाघों के मध्य होता है,इसके बाद कुछ अण्डाकार व कुछ अर्ध चन्द्राकार छेद होता है जिसे भग द्वार या योनिमुख कहते हैं।योनिमुख के दोनो ओर लम्बा सा उभार होता है जिस पर बाल उगे रहते हैं।
भगांकुर या clitoris -( काम भाव जाग्रत करने का मुख्य अंग)
इसमें अन्दर की  ओर चिकना व माँसल भाग होता है जिसे बडा  ओष्ठ या libia majora कहते हैं।जिसके दोनो सिरे आपस में मिले रहते रहते हैंऔर जहाँ ये ऊपर मिलते हैं वह संगम स्थल भगांकुर या clitoris कहलाता है।यही से मुख्यतः काम भाव जाग्रत होता है।इस भगांकुर की रचना कुछ कुछ पुरुष जननेन्द्रिय जैसी है।इसमे पुरुष जननेन्द्रिय की तरह ही हड्डियाँ या नसे नही होती यह भी थोड़ी सी रगड़ पाकर या फिर स्पर्श से तन कर फूल जाती है और स्त्री में कामोत्तेजना पैदा हो जाती है।यह बड़े ओष्ठ के मिलन स्थल से लगभग 1 या 1.25 सेमी. नीचे अन्दर की ओर होता है।
भगालिन्द या vestibulae--
भगांकुर के नीचे योनिमुख के ऊपर छोटे आष्ठों के बीच में एक तिकोनी सी जगह होती है जिसे भगालिन्द या vestibulae कहते हैं।इसके बीच में योनिमुख या छिद्र होता है यही मूत्रद्वार भी खुलता है।योनि के आरम्भ में दोनो ओष्ठों के पीछे एक ग्रंथि ढकी अवस्था में रहती है जो कामभाव पैदा करने के लिए उत्तरदायी है।भगालिंद से गर्भाशय तक फैला हुआ जिसके आगे की ओर मूत्राशय व पीछे की ओर का भाग मलाशय होता है के बीच मे योनिमार्ग स्थित रहता है।इसका मुख नीचे की अपेक्षा ऊपर को अधिक फैला हुआ रहता है।ऊपर की तरफ  इसमें गर्भाशय की गर्दन का योनि वाला भाग होता है।

2- आंतरिक स्त्री कामांग

 योनि या  Vagina---- 
प्रथम अंतः जनन अंग है यह एक15 सेमा.  लम्बी  नाली के जैसी संरचना है जो मांसपेशियों व झिल्ली से बनी होती है तथा जो योनिमुख से गर्भाशय द्वार तक जाती है।यह नाली योनि मुख पर व नाली के अंतिम सिरे पर तंग तथा बीच में चोड़ी होती है।यह तीन परतो वाली संरचना है तथा इसकी अगली व पिछली दीवारों पर खड़ी लकीरे पायी जाती हैं।इन लकीरों के मध्य में बहुत सी छोटी -2  ऐसी श्लैश्मिक ग्रंथियाँ होती हैं जिनसे संभोग के समय विशेष प्रकार के तरल स्राव निकल कर योनि को गीला और चिकना बनाते हैं तथा संभोग में मदद करते है।यह नाली जैसी संरचना संभोग,मासिक स्राव,व प्रसव की क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
        Uterus या गर्भाशय ---
   मूत्राशय और मलाशय के बीच में नीचे को मुँह  किये हुये नासपाती के समान थैली जैसी  एक संरचना  10×6  cm वाली पेड़ू मे पायी जाती है जिसे Uterus या गर्भाशय कहते हैं। इसका वजन लगभग 6 औंस के करीव होता है। इसके अन्दर ही गर्भ बनता है तथा यही उसका विकास होकर बच्चा विकसित होता है।गर्भाशय आठ वंधनो द्वारा अपने स्थान पर अवस्थित रहता है जिस प्रत्येक बंधन में दो तहें होती है इन्हीं तहों के बीच-2  में फैलोपियन ट्यूव,ओवरीज व गोल गोल लिगंमेट्स होता है।गर्भाशय को तीन भागों में विभाजित किया गया है।
1- गर्भाशय गर्दन (Cervix Uteri or Cervical canal)-----  
           
2- गर्भाशय( Body of Uterus)
गर्भाशय का भीतरी भाग गर्भगुहा कहलाता है।यह त्रिकोण के आकार का होता है।यौवनावस्था में यह 6.25 सेमी. का तथा गर्भावस्था में 22.से 30 सेमी. का हो जाता है।
अण्डाशय या डिंबग्रंथि (Ovaries)---
स्त्री के गर्भाशय के दोनो ओर रंग में सफेद तथा बादाम के आकार की अण्डाशय या डिंबग्रंथि (Ovaries)नामक दो ग्रंथियाँ होती हैं ये पुरुषों मे पाये जाने बाले अण्डकोशों के समान होती हैं।
स्त्री के जननागों की सक्षिप्त जानकारी हो जाने के बाद अब आप यह समझ सकते हैं कि जब इन अंगो मे कोई विकार पैदा हो जाए या इनकी क्रिया विधि गड़वड़ा जाए तभी संभोग क्रिया कष्टप्रद हो जाएगी 
अब स्त्रियों में होने बाले रोगों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

स्त्रियों में होने वाले सामान्य रोग योनि में खुजली हो जाना,योनि का तंग हो जाना,योनि का शिथिल या ढीली  हो जाना,योनि में घाव होना,जरायु या गर्भ प्रदाह, आदि  हैं।


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