800 औषधीय पौधों के विलुप्त होने का खतरा- खबर साभार http://naidunia.jagran.com/ से - Ayurveda : A Holistic approach to Health, age and Longevity

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Tuesday, October 28, 2014

800 औषधीय पौधों के विलुप्त होने का खतरा- खबर साभार http://naidunia.jagran.com/ से

भक्त दर्शन पांडेय, बागेश्‍वर। जलवायु परिवर्तन औषधीय वनस्पतियों के लिए बड़ा खतरा बन रहा है। वैश्विक ताप में वृद्धि और अत्यधिक दोहन के कारण हिमालयी रेंज की 800 औषधीय गुणों युक्त प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। यदि औषधीय पौधों के संरक्षण की पहल नहीं हुई तो आयुर्वेद चिकित्सा पर संकट आ जाएगा।  विश्‍व में औषधीय पौधों की लगभग 2500 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें 1158 प्रजातियां भारत में हैं। इन औषधीय पौधों की सनातन उपयोगिता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इनका उल्लेख वेदों में भी किया गया है। इनमें से 81 औषधीय पौधों का वर्णन यजुर्वेद, 341 वनस्पतियों का अथर्ववेद, 341 का चरक संहिता और 395 औषधीय पादपों और प्रयोग का वर्णन सुश्रुत में है।  भारत के उच्च हिमालयी और मध्य हिमालयी रेंज में पाई जाने वाले गन्द्रायण, कालाजीरा, जम्बू, ब्राह्माी, थुनेर, घृतकुमारी, गिलोय, निर्गुंडी, इसवगोल, दुधी, चित्रक, बहेड़ा, भारंगी, कुटज, इन्द्रायण,पिपली, सत्यानाशी, पलास, कृष्णपर्णी, सालपर्णी, दशमूल, श्योनांक, अश्र्वगंधा, पुनर्नवा, अरण आदि जड़ी बूटियां अब दुर्लभ होती जा रही हैं। इसका कारण जलवायु परिवर्तन और वनों से जड़ी-बूटियों का अवैज्ञानिक तरीके से किया जा रहा दोहन को माना जा रहा है।  आयुर्वेदाचार्य डॉ.नवीन चंद्र जोशी के मुताबिक पिछले कुछ दशकों के भीतर बढ़ती आयुर्वेदिक दवाओं की मांग को पूरा करने के लिए औषधीय पौधों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। भारत के हिमालयीन रेंज में पाई जाने वाले औषधीय पादपों पर संकट छाया हुआ है। तापमान में बढोत्तरी से भी जड़ी बूटियां विलुप्त हो रही हैं  "औषधीय पौधों की जो प्रजातियां संकट में हैं उनके संरक्षण के प्रयास हो रहे हैं। औषधीय पादपों पर शोध कार्य चल रहे हैं। इनकी नर्सरी तैयार की जा रही हैं। तराई से लेकर उच्च हिमालयीन क्षेत्र तक के काश्तकारों को मेडिसिनल प्लांट की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।"  -डॉ. विजय भट्ट, वैज्ञानिक, जड़ी-बूटी शोध संस्थान, गोपेश्‍वर(चमोली) - See more at: http://naidunia.jagran.com/national-800-medicinal-plants-likely-to-extinct-97227#sthash.F2YCjwNV.dpuf
भक्त दर्शन पांडेय, बागेश्‍वर। जलवायु परिवर्तन औषधीय वनस्पतियों के लिए बड़ा खतरा बन रहा है। वैश्विक ताप में वृद्धि और अत्यधिक दोहन के कारण हिमालयी रेंज की 800 औषधीय गुणों युक्त प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। यदि औषधीय पौधों के संरक्षण की पहल नहीं हुई तो आयुर्वेद चिकित्सा पर संकट आ जाएगा।
विश्‍व में औषधीय पौधों की लगभग 2500 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें 1158 प्रजातियां भारत में हैं। इन औषधीय पौधों की सनातन उपयोगिता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इनका उल्लेख वेदों में भी किया गया है। इनमें से 81 औषधीय पौधों का वर्णन यजुर्वेद, 341 वनस्पतियों का अथर्ववेद, 341 का चरक संहिता और 395 औषधीय पादपों और प्रयोग का वर्णन सुश्रुत में है।
भारत के उच्च हिमालयी और मध्य हिमालयी रेंज में पाई जाने वाले गन्द्रायण, कालाजीरा, जम्बू, ब्राह्माी, थुनेर, घृतकुमारी, गिलोय, निर्गुंडी, इसवगोल, दुधी, चित्रक, बहेड़ा, भारंगी, कुटज, इन्द्रायण,पिपली, सत्यानाशी, पलास, कृष्णपर्णी, सालपर्णी, दशमूल, श्योनांक, अश्र्वगंधा, पुनर्नवा, अरण आदि जड़ी बूटियां अब दुर्लभ होती जा रही हैं। इसका कारण जलवायु परिवर्तन और वनों से जड़ी-बूटियों का अवैज्ञानिक तरीके से किया जा रहा दोहन को माना जा रहा है।
आयुर्वेदाचार्य डॉ.नवीन चंद्र जोशी के मुताबिक पिछले कुछ दशकों के भीतर बढ़ती आयुर्वेदिक दवाओं की मांग को पूरा करने के लिए औषधीय पौधों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। भारत के हिमालयीन रेंज में पाई जाने वाले औषधीय पादपों पर संकट छाया हुआ है। तापमान में बढोत्तरी से भी जड़ी बूटियां विलुप्त हो रही हैं
"औषधीय पौधों की जो प्रजातियां संकट में हैं उनके संरक्षण के प्रयास हो रहे हैं। औषधीय पादपों पर शोध कार्य चल रहे हैं। इनकी नर्सरी तैयार की जा रही हैं। तराई से लेकर उच्च हिमालयीन क्षेत्र तक के काश्तकारों को मेडिसिनल प्लांट की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।"
-डॉ. विजय भट्ट, वैज्ञानिक, जड़ी-बूटी शोध संस्थान, गोपेश्‍वर(चमोली)
- See more at: http://naidunia.jagran.com/national-800-medicinal-plants-likely-to-extinct-97227#sthash.F2YCjwNV.dpuf
भक्त दर्शन पांडेय, बागेश्‍वर। जलवायु परिवर्तन औषधीय वनस्पतियों के लिए बड़ा खतरा बन रहा है। वैश्विक ताप में वृद्धि और अत्यधिक दोहन के कारण हिमालयी रेंज की 800 औषधीय गुणों युक्त प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। यदि औषधीय पौधों के संरक्षण की पहल नहीं हुई तो आयुर्वेद चिकित्सा पर संकट आ जाएगा।
विश्‍व में औषधीय पौधों की लगभग 2500 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें 1158 प्रजातियां भारत में हैं। इन औषधीय पौधों की सनातन उपयोगिता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इनका उल्लेख वेदों में भी किया गया है। इनमें से 81 औषधीय पौधों का वर्णन यजुर्वेद, 341 वनस्पतियों का अथर्ववेद, 341 का चरक संहिता और 395 औषधीय पादपों और प्रयोग का वर्णन सुश्रुत में है।
भारत के उच्च हिमालयी और मध्य हिमालयी रेंज में पाई जाने वाले गन्द्रायण, कालाजीरा, जम्बू, ब्राह्माी, थुनेर, घृतकुमारी, गिलोय, निर्गुंडी, इसवगोल, दुधी, चित्रक, बहेड़ा, भारंगी, कुटज, इन्द्रायण,पिपली, सत्यानाशी, पलास, कृष्णपर्णी, सालपर्णी, दशमूल, श्योनांक, अश्र्वगंधा, पुनर्नवा, अरण आदि जड़ी बूटियां अब दुर्लभ होती जा रही हैं। इसका कारण जलवायु परिवर्तन और वनों से जड़ी-बूटियों का अवैज्ञानिक तरीके से किया जा रहा दोहन को माना जा रहा है।
आयुर्वेदाचार्य डॉ.नवीन चंद्र जोशी के मुताबिक पिछले कुछ दशकों के भीतर बढ़ती आयुर्वेदिक दवाओं की मांग को पूरा करने के लिए औषधीय पौधों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। भारत के हिमालयीन रेंज में पाई जाने वाले औषधीय पादपों पर संकट छाया हुआ है। तापमान में बढोत्तरी से भी जड़ी बूटियां विलुप्त हो रही हैं
"औषधीय पौधों की जो प्रजातियां संकट में हैं उनके संरक्षण के प्रयास हो रहे हैं। औषधीय पादपों पर शोध कार्य चल रहे हैं। इनकी नर्सरी तैयार की जा रही हैं। तराई से लेकर उच्च हिमालयीन क्षेत्र तक के काश्तकारों को मेडिसिनल प्लांट की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।"
-डॉ. विजय भट्ट, वैज्ञानिक, जड़ी-बूटी शोध संस्थान, गोपेश्‍वर(चमोली)
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भक्त दर्शन पांडेय, बागेश्‍वर। जलवायु परिवर्तन औषधीय वनस्पतियों के लिए बड़ा खतरा बन रहा है। वैश्विक ताप में वृद्धि और अत्यधिक दोहन के कारण हिमालयी रेंज की 800 औषधीय गुणों युक्त प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। यदि औषधीय पौधों के संरक्षण की पहल नहीं हुई तो आयुर्वेद चिकित्सा पर संकट आ जाएगा।
विश्‍व में औषधीय पौधों की लगभग 2500 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें 1158 प्रजातियां भारत में हैं। इन औषधीय पौधों की सनातन उपयोगिता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इनका उल्लेख वेदों में भी किया गया है। इनमें से 81 औषधीय पौधों का वर्णन यजुर्वेद, 341 वनस्पतियों का अथर्ववेद, 341 का चरक संहिता और 395 औषधीय पादपों और प्रयोग का वर्णन सुश्रुत में है।
भारत के उच्च हिमालयी और मध्य हिमालयी रेंज में पाई जाने वाले गन्द्रायण, कालाजीरा, जम्बू, ब्राह्माी, थुनेर, घृतकुमारी, गिलोय, निर्गुंडी, इसवगोल, दुधी, चित्रक, बहेड़ा, भारंगी, कुटज, इन्द्रायण,पिपली, सत्यानाशी, पलास, कृष्णपर्णी, सालपर्णी, दशमूल, श्योनांक, अश्र्वगंधा, पुनर्नवा, अरण आदि जड़ी बूटियां अब दुर्लभ होती जा रही हैं। इसका कारण जलवायु परिवर्तन और वनों से जड़ी-बूटियों का अवैज्ञानिक तरीके से किया जा रहा दोहन को माना जा रहा है।
आयुर्वेदाचार्य डॉ.नवीन चंद्र जोशी के मुताबिक पिछले कुछ दशकों के भीतर बढ़ती आयुर्वेदिक दवाओं की मांग को पूरा करने के लिए औषधीय पौधों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। भारत के हिमालयीन रेंज में पाई जाने वाले औषधीय पादपों पर संकट छाया हुआ है। तापमान में बढोत्तरी से भी जड़ी बूटियां विलुप्त हो रही हैं
"औषधीय पौधों की जो प्रजातियां संकट में हैं उनके संरक्षण के प्रयास हो रहे हैं। औषधीय पादपों पर शोध कार्य चल रहे हैं। इनकी नर्सरी तैयार की जा रही हैं। तराई से लेकर उच्च हिमालयीन क्षेत्र तक के काश्तकारों को मेडिसिनल प्लांट की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।"
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