पुरुष जननांगो की रचना व क्रिया विधि व शुक्र निर्माण( का शेष भाग) - Ayurveda : A Holistic approach to Health, age and Longevity

Breaking

Ayurveda : A Holistic approach to Health, age and Longevity

Ayurveda-A Natural Treatment

Ancient Natural Traditional Science

WWW.AYURVEDLIGHT.COM

Sunday, October 28, 2012

पुरुष जननांगो की रचना व क्रिया विधि व शुक्र निर्माण( का शेष भाग)

शुक्राशय की रचना- शुक्राशय असलियत में दो थैलियों जैसी रचना है जो शुक्रनाली के नीचे व ऊपर लगी होती हैं।यह एक लगभग ढाई इंच की चौड़ाई लिऐ होती हैं जिसमें शुक्र प्रणाली स्थित होती है।यह प्रणाली जहाँ शुक्राशय से मिलती हैं वहीं से सूक्ष्म पतली सी शिराऐं आरम्भ होती हैं।इन्है शुक्रवाहनी या Ejaculatoryduct कहते हैं।इसकी लम्बाई एक इन्च से कुछ कम होती है।यही शुक्रवाहिनी पुनः शुक्राशय ग्रंथि में घूम कर दोनो ओर से लिंग मूल में मूत्रमार्ग में खुल जाती है।शुक्राशय ग्रन्थि में बना वीर्य  इसी मार्ग से शुक्रप्रणालियों द्वारा आकर शुक्राशय में एकत्र हो जाता है।और संभोग के समय शुक्रवाहिनी से होता हुआ मूत्रमार्ग से निकलता है।
काउपर ग्रंथियाँ-  लिंग मूल में ही मूत्र विसर्जन नलिका के दोनो ओर पौरुष ग्रंथियो के शिखर से कुछ नीचे की ओऱ मटर के दाने के आकार की पीले से रंग की ग्रंथियाँ पायी जाती हैं ये ही काउपर ग्लेण्ड्स या काउपर ग्रंथियाँ कहलाती हैं।काउपर ग्रंथियों से कामोत्तेजना की अवस्था में सफेद चिकना सा पतला स्राव स्रावित होता है जो यहाँ से पैदा होकर उस स्थान पर गिरता है जहाँ मूत्र भी गिरता है अर्थात मूत्रप्रणाली में गिरता है।और इसका कार्य है मूत्र के द्वारा बनाए हुए अम्लीय वातावरण की अम्लीयता अपने में समाहित क्षार द्वारा कम करके शुक्राणुओं के जीवित रहने के लिए माहौल पैदा करना है।क्योंकि शु्क्राणु अम्लीय माहौल में जीवित नही रह सकते।औऱ यह स्राव उन्है गर्भाशय तक जीवित अवस्था में पहुचाने में सहायक है।
यह शुक्र निर्माण की क्रिया विधि है जिसे पढ़कर आप बहुत कुछ जान सकते है तथा अज्ञानता वश नीम हकीमो के द्वारा वरगलाए नही जा सकेंगे।
मैरा उद्देश्य है कि विश्व में आयुर्वेद की रोशनी घरघऱ फैले लोग जाने कि भारतीय चिकत्सा प्रणाली को लोग जाने कि ऋषि मुनियों ने जिनके पास उस युग में आज के चिकित्सा शास्त्र की तरह यंत्र उपलब्ध नही थे फिर भी एसी सटीक प्रणाली उन्हौने दी कि कोई साइड इफेक्ट आज तक कोई नही बता सकता जवकि आजकल इतने यंत्रो के होने के वावजूद साइड इफेक्ट्स की भरमार है।अतः एसी प्रणाली का प्रचार करना ही नही खुद भी प्रयोग करना हमारी खासकर भारतीय समाज की यह प्राथमिकता होनी चाहिये।
चित्र देखने के लिए यहाँ नीचे रीड मोर वाले स्थान पर क्लिक करें यहीं एक एसी वेव साइट का लिंक भी दे रहा हुँ जहाँ आप इग्लिस में और ज्यादा जानकारी ले सकते हैं

     चित्र  साभार जिस वेव साइट से लिए हैं उसका लिंक यह है यहाँ आप और भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।



अंग्रेजी में पढ़ने के लिऐ यहाँ दवाऐ

1 comment:

  1. shree maan mujhe aapka email adress nhi mil rha hai.samajh me nhi aata ki aapko kese email krun.aap mujhe email kren

    Aamir2692@Gmail.com

    ReplyDelete

OUR AIM

ध्यान दें-

हमारा उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व में आय़ुर्वेद सम्बंधी ज्ञान को फैलाना है।हम औषधियों व अन्य चिकित्सा पद्धतियों के बारे मे जानकारियां देने में पूर्ण सावधानी वरतते हैं, फिर भी पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी औषधि या पद्धति का प्रयोग किसी योग्य चिकित्सक की देखरेख में ही करें। सम्पादक या प्रकाशक किसी भी इलाज, पद्धति या लेख के वारे में उत्तरदायी नही हैं।
हम अपने सभी पाठकों से आशा करते हैं कि अगर उनके पास भी आयुर्वेद से जुङी कोई जानकारी है तो आयुर्वेद के प्रकाश को दुनिया के सामने लाने के लिए कम्प्युटर पर वैठें तथा लिख भेजे हमें हमारे पास और यह आपके अपने नाम से ही प्रकाशित किया जाएगा।
जो लेख आपको अच्छा लगे उस पर
कृपया टिप्पणी करना न भूलें आपकी टिप्पणी हमें प्रोत्साहित करने वाली होनी चाहिए।जिससे हम और अच्छा लिख पाऐंगे।