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Tuesday, May 30, 2017

एलर्जी कारण व आयुर्वेदिक निवारण

है क्या एलर्जी?

शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमत जब कुछ बाहरी तत्वों, जैसे पराग कण, धूल, भोजन इत्यादि के प्रति  कुछ कम हो जाती है तो उसे हम वैज्ञानिक भाषा में एलर्जी कहते हैं।आज पूरे विश्व में यह रोग तेजी से फैल रहा है।और हालात यहाँ तक हो चुके हैं कि  युवा अवस्था एवं बाल्यावस्था में भी एलर्जी रोग देखने में आ रहा है। एलर्जी करने वाले तत्वों को एलरजेन कहा जाता है। ये एलरजेन या एलर्जी पैदा करने वाले तत्व वास्तव में कोई हानिकारक कीटाणु या विषाणु नहीं बल्कि अहानिकर तत्व ही होते हैं, जैसे पानी, गेहूं, बादाम, दूध, पराग कण या वातावरण में मौजूद कुछ प्राकृतिक तत्व। यही कारण है कि सभी लोगों को ये हानि नहीं पहुंचाते। एक ही घर में, एक ही प्रकार के वातावरण से एक व्यक्ति को एलर्जी होती है तो दूसरे को नहीं। 

आखिर क्या कारण होता है एलर्जी का? क्यों किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति हानिकारक प्रतिक्रिया करती है?

आयुर्वेदानुसार एक स्वस्थ व्यक्ति में वात पित्त व कफ साम्य अवस्था  में होते हैं। इसी कारण उनकी रोग प्रतिरोध शक्ति किसी एलरजेन के सम्पर्क में आकर भी किसी प्रकार की  प्रतिक्रिया  अर्थात एलर्जी पैदा नहीं करती है। जब ये त्रिदोष साम्यावस्था में  रहते हैं तो हमारे शरीर की ओज शाक्ति उत्तम होती है। और जब उत्तम ओज होता है तो किसी प्रकार की ऐलर्जी या रोग हो ही नही सकता या कहैं कि प्रतिरोधक क्षमता होने पर कोई रोग शरीर पर टिक ही नही सकता है, यानि उत्तम रोग प्रतिरोधक शक्ति हमारे शरीर से नियमित रूप से हानिकारक तत्वों को निष्कासित करती है और इसी कारण कोई भी बाहरी तत्व उसमें किसी प्रकार की प्रतिक्रिया कर ही नही सकता।

आयुर्वेदानुसार एलर्जी का मूल कारण है आपकी असामान्य पाचक अग्नि, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता,और दोषों की विषमता। इसमें भी अधिक महत्व पाचक अग्नि का माना गया है। जब पाचक अग्नि से भोजन का सही रूप पाक नहीं हो पाता है तो भोजन अधपचा रहता है। इस अधपके भोजन से एक चिकना विषैला पदार्थ पैदा होता है जिसे ‘आम’ कहते हैं। यह आम ही एलर्जी का मूल कारण होता है। यदि समय रहते इस आम का उपचार नहीं किया जाए तो यह आतों में जमा होने लगता है और पूरे शरीर में भ्रमण करता है। जहां कहीं इसको कमजोर स्थान मिलता है वहां जाकर जमा हो जाता है और पुराना होने पर आमविष कहलाता है। आमविष हमारी ओज शक्ति को दूषित कर देता है। इसके कारण, जब कभी उस स्थान या अवयव का सम्पर्क एलरजेन से होता है तो वहां एलर्जी प्रतिक्रिया होती है।

यदि आमविष त्वचा में है तो एलरजन के सम्पर्क में आने से वहां पर खुजली, जलन, आदि लक्षण होते है, यदि आमविष श्वसन संस्थान में है तो श्वास कष्ट, छीकें आना, नाक से पानी गिरना, खांसी इत्यादि और यदि पाचन संस्थान में है तो अतिसार, पेट दर्द, अर्जीण आदि लक्षण होते हैं।

पाचक अग्नि के अतिरिक्त वात, पित्त, कफ के वैषम्य से भी प्रतिरोधक क्षमता क्षीण एवं दूषित हो जाती है जिसकी वजह से एलर्जी हो सकती है। इसके अलावा तनाव, नकारात्मक सोच, शोक, चिन्ता आदि भी हमारे पाचन पर असर डालते हैं, जिससे आँव पैदा होता है। इसलिए कुछ लोगों में एलर्जी का मूल कारण मानसिक विकार भी माना गया है। इसके अतिरिक्त कई बार एलर्जी रोग को अनुवांशिक यानि हैरीडिटीकल भी माना गया है। क्योंकि कुछ लोगों में जन्म से ही पाचक अग्नि एवं प्रतिरोधक क्षमता क्षीण या कमजोर होती है।

आयुर्वेदिक उपचार

आयुर्वेद में एलर्जी का सफल इलाज है। आयुर्वेदिक उपचार रोग के मूल कारण को नष्ट करने में सक्षम होने के कारण रोग को जड़ से ठीक करता है। एलर्जी के उपचार में आमविष के निस्कासन के लिए औषधि दी जाती है। इसलिए सर्वप्रथम शोधन चिकित्सा करते हैं, जिससे शरीर में जमे आम विष को नष्ट किया जाता है। इसके अतिरिक्त दोषों एवं धातुओं को साम्यावस्था में लाकर ओज शक्ति को स्वस्थ बनाया जाता है। यदि रोगी मानसिक स्तर पर अस्वस्थ है तो उसका उपचार किया जाता है और एलर्जी के लक्षणों को शान्त करने के लिए भी औषधि दी जाती है।

उचित उपचार के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श लें और उनके द्वारा दी गई। औषधियों का नियमित रूप से सेवन करें। रोग पुराना एवं कष्ट साध्य होने के कारण ठीक होने में कुछ समय लेगा, इसलिए संयम के साथ चिकित्सक के परामर्शनुसार औषधियों एवं आहार-विहार का सेवन करें। यदि आप एलर्जी से पीड़ित हैं तो औषधियों के साथ-साथ निम्न उपचारों के प्रयोग से भी आपको लाभ मिलेगा।

घरेलू उपचार

पानी में ताजा अदरक, सोंफ एवं पौदीना उबालकर उसे गुनगुना होने पर पीयें।, इसे आप दिन में 2-3 बार पी सकते हैं। इससे शरीर के स्रोतसों की शुद्धि होती है एवं आम का पाचन होता है।

लघु एवं सुपाच्य भोजन करें जैसे लौकी, तुरई, मूंग दाल, खिचड़ी, पोहा, उपमा, सब्जियों के सूप, उबली हुई सब्जियां, ताजे फल, ताजे फलों का रस एवं सलाद इत्यादि। सप्ताह में एक दिन उपवास रखें, केवल फलाहार करें। नियमित रूप से योग और प्राणायाम करें। रात को सोते समय एक चम्मच त्रिफला चूर्ण लें और हर रोज एक बड़ा चम्मच च्यवनप्राश लें।

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