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Saturday, October 18, 2014

आयुर्वेद की परम दिव्य औषधि अमृता बनाती है मानव को सदाबहार



अमृता जैसा कि इसका नाम है वैसे ही गुणों को समाहित करने वाली दिव्य औषधि है जो कई वार तो आती हुयी मृत्यु को भी रोक देने की क्षमता रखती है आयुर्वेद के सिद्धान्तों के अनुसार ‘वृद्धिःसमानेःसर्वेषाम’ अर्थात गुरु से गुरु द्रव्यो व लघु से लघु द्रव्यों की उत्पत्ति होती है वैसे ही अमृता से अमृत के समान गुणों की उत्पत्ति होती है।नित्य युवा रहने के लिए अमृता श्रेष्ठ है।अमृता लोक बोलचाल की भाषा में गिलोय के नाम से जानी जाती है।यदि इसकी जड़ कट जाए तब भी जिन्दा रहने वाली परम औषधि अमृता नित्य सेवन करने पर जीवन को सदावहार बना देती है रोग सैकड़ों कोस की दूरी पर रहता है।बुढ़ापा तो एसे व्यक्ति को शायद छू ही नही पाता है।गुणों में शीतलता का गुण होने के कारण इसे चन्द्रहासा भी कहा जाता है।शरीर में बुखार हो,पित्त कुपित हो,एसीडिटी हो अर्थात किसी भी प्रकार की गर्मी क्यों न हो यह प्रत्येक प्रकार की गर्मी में लाभ पहुँचाती है। गर्मी या पित्त बढ़ जाने से जब रक्त नही बनता एसी गर्मी हो,अलग अलग मार्गों से रक्त बहता हो एसी गर्मी हो,हाथ पैर के तालुओं में आँखों में जलन हो मल या मूत्र मार्ग से जलन का होना,इन सब विकारों में गिलोय या अमृता उत्तम शीतलता प्रदान गरमी को दूर करती है। खुद उष्ण होने पर गर्मी को दूर करती है।एसा विचित्र गुण होने पर इसे आयुर्वेद में विचित्र प्रत्याशा द्रव्य कहा गया है। गिलोय हमेशा ताजी व हरी ही प्रयोग करनी चाहिये गिलोय की डण्डी से निकलने वाला रस कड़ुआ,चिकना व हरे रंग का व चिकनापन लिए होता है। काँच के वर्तन में गिलोय का रस रख देने पर आधे घण्टे में गिलोय का सत्व नीचे जम जाता है। यह सत्व सफेद रंग का होता है। यह उत्तम ताकत देने वाला व त्रिदोषनाशक है। गिलोय के काढ़े को गरम करके बनाए हुये घन को संशमनी कहा जाता है। सदा तरोताजा रहने के लिए रसायन विधि से गिलोय के रस का या उसके सत्व का सेवन करना चाहिये।

गिलोय सत्व बनाने की विधि----
नीम या आम पर चढ़ी हुयी कम से कम 4 साल पुरानी अँगूठे जितने मोटी गिलोय लेकर उसके उँगली जैसे छोटे छोटे टुकड़े कर ले फिर उसे पानी से साफ कर लें तथा कलई या स्टील की कढ़ाई में 6 घण्टे तक भिगोकर रखें बाद में हाथ से खूब मसलकर मिक्सर में डाल कर उसका रस निकाल लें उस बरतन को कुछ समय तक विना हिलाए चलाए रख छोड़े फिर उपर से निथार लें एसा करके 2-3 बार करने से विल्कुल चमकदार सफेद रंग का सत्व अलग हो जाता है।उसको सुखाकर एक काँच की शीशी में भर लें।
सत्व सेवन की विधि------
गाय के धारोष्ण दूध से 10 ग्राम शक्कर डालकर 1 से 2 ग्राम सत्व दें।जीर्ण ज्वर में घी औऱ और शक्कर के साथ में या शहद के साथ या शहद व पीपल चूर्ण के साथ मे अथवा गुड़ और काला जीरा के साथ में दें।शरीर की जलन में जीरा व शक्कर के साथ दें।प्रमेह में विना शक्कर के गाय के दूध के साथ दें।भोजन की अरुचि होने पर अनार के रस के साथ क्षय या राजयक्ष्मा में घी शक्कर और शहद के साथ दें।मूत्रकच्छ रोग या उस रोग में जबकि पेशाव बूंद बूँद करके आता हो दूध के साथ दें इसको घी व शक्कर के साथ नीयमित रुप से सेबन करके सदाबहार यौवन प्राप्त किया जा सकता है।
फिर किसी दिन अमृता के अन्य योगों की भी चर्चा करेंगें।

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1 comment :

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति रविवार के - चर्चा मंच पर ।।

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