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Thursday, October 12, 2017

नागबला - एक सर्वोत्कृष्ट औषधि- Nagbala- An Excellent ayurvedic medicine

नागबला टिलिएसी TILIACEAE कुल का पौधा है जिसे संस्कृत में नागबला व गुडशर्करा के नाम से जाना जाता है।इसका वैज्ञानिक नाम वानस्पतिक नाम ग्रेविया हिर्सटा grewia-hirsuta है।जो समुद्रतल से 3500 फीट  के ऊपर ऊंचाई पर क्षैतिज क्षेत्र में उपलब्ध है।

 नागबला को हिंदी में गुलशक्री, गुदखंडी,मराठी में गोवली Govli, तेलगु में जिविलिकी Jivilike तमिल में तविदु Tavidu के नाम से जाना जाता है। इसकी जड़ का आयुर्वेदिक योगों में प्रयोग किया जाता है जिसकी मात्रा 3 से 6 ग्राम चूर्ण के रुप में प्रयोग किया जाता है।अगर इसकी जड़ का क्वाथ लिया जाऐ तो मात्रा 50 से 60 मिलीलीटर लेना चाहिये।


आयुर्वेदिक गुण- GUNA (Quality)-

 नागबला गुरु, स्निग्ध व पिच्छल है जो स्वाद अर्थात रस RASA (Taste) में  मधुर व कषाय रस वाली औषधि है। यह विपाक  अर्थात  (Metabolism)में -मधुर है। इस औषधि की तासीर अर्थात VIRYA (Potency) वीर्य-शीतवीर्य और रसायन प्रभाव (Impact)रखती है।

नागबला के चिकत्सकीय उपयोग-

THERAPEUTIC USES - Mental diorders मानसिक विकार · Nervin disorders तंत्रिका या नर्व के विकार · Uterine isorders मूत्र संबंधी विकार,Urinary tract infection मूत्र पथ रुकने के विकार,Rasayan रसायन, Strength and vigour ताकतवर · Anti-pyretic · Heart ailments हृदय विकारों में लाभकारी

FORMULATIONS (IS)- यह औषधि नीचे लिखे योगों का एक प्रमुख घटक है।

Lakshmvilasa rasa (nardadiya) लक्ष्मीविलास रस, Maha Vishgarbha Taila महाविषगर्भ तेल,Manashamitra Gutika मानसमित्र गुटिका तथा Shatawaryadi Churna शतावर्यादि चूर्ण में इस औषधि का उपयोग किया जाता है।

नागबला के अन्य उपयोग-

नागबला का उपयोग हृदय रोग में होता है नागबला की जड़ और अर्जुन वृक्ष (टर्मिनलिया) की छाल का मिश्रण मिलाकर दूध के साथ प्रयोग किया जाता है। इस नुस्खे के एक महीने के प्रयोग से यह गर्मी की बीमारी, खांसी और डिस्पेनिया को भी समाप्त कर देता है।अगर एक वर्ष के लिए इस उत्कृष्ट रसायन को प्रयोग किया जाऐ तो व्यक्ति आयुर्वेदानुसार सौ वर्षों पूर्ण जीवन को प्राप्त करता है।
नागबला सामान्य विकृति और मांसपेशी के रोगों, व मानसिक रोगों में एक उपयोगी टॉनिक है। यह मस्तिष्क के लिए एक बेहतरीन टॉनिक है।
यह एक बेहतरीन रसायन व श्रेष्ठ वाजीकारक है जो वात और पित्त के दोषों को दूर करने वाला है। जो व्यक्ति के शरीर में सभी धातुओं का सम्वर्धन करता है।

पारंपरिक उपयोग:

बजन वढ़ाना---

अगर नागबला के चूर्ण को शुद्ध देशी घी और शहद के साथ लिया जाए तो यह पाउडर वजन बढ़ाने में उपयोगी होता है।

हृदय व फेंफड़ों की मजबूती के लिए---

नागबला के चूर्ण को दूध से लिया जाता है तो यह हृदय और फेफड़ों को मजबूत करता है, इसलिए हृदय रोगों और श्वसन रोगों में फायदेमंद होता है जिससे फेंफड़ों व हृदय को ताकत प्राप्त होती है।
सेवनीय मात्रा----
नागबला के चूर्ण की एक से छह ग्राम मात्रा दूध अथवा घी व शहद अथवा लहसुन के साथ लेना पर्याप्त है।


Thursday, October 5, 2017

महिलाओं की जनन व कामांगों सम्बन्धी समस्याऐं व उनका सामान्य निदान प्रश्नोत्तरी

peedadayak mahavari पीड़ादायक महाबारी
पीड़ादायक महावारी

पीड़ा दायक माहवारी क्या होती है?

पीड़ा दायक माहवारी मे निचले उदर में ऐंठनभरी पीड़ा होती है। किसी औरत को तेज दर्द हो सकता है जो आता और जाता है या मन्द चुभने वाला दर्द हो सकता है। इन से पीठ में दर्द हो सकता है। दर्द कई दिन पहले भी शुरू हो सकता है और माहवारी के एकदम पहले भी हो सकता है। माहवारी का रक्त स्राव कम होते ही सामान्यतः यह खत्म हो जाता है।
peedadayak mahavari पीड़ादायक महाबारी
पीड़ादायक महावारी

पीड़ादायक माहवारी का आप घर पर क्या उपचार कर सकते हैं?

निम्नलिखित उपचार हो सकता है कि आपको पर्चे पर लिखी दवाओं से बचा सकें। (1) अपने उदर के निचले भाग (नाभि से नीचे) गर्म सेक करें। ध्यान रखें कि सेंकने वाले पैड को रखे-रखे सो मत जाएं। (2) गर्म जल से स्नान करें। (3) गर्म पेय ही पियें। (4) निचले उदर के आसपास अपनी अंगुलियों के पोरों से गोल गोल हल्की मालिश करें। (5) सैर करें या नियमित रूप से व्यायाम करें और उसमें श्रेणी को घुमाने वाले व्यायाम भी करें। (6) साबुत अनाज, फल और सब्जियों जैसे मिश्रित कार्बोहाइड्रेटस से भरपूर आहार लें पर उसमें नमक, चीनी, मदिरा एवं कैफीन की मात्रा कम हो। (7) हल्के परन्तु थोड़े-थोड़े अन्तराल पर भोजन करें। (8) ध्यान अथवा योग जैसी विश्राम परक तकनीकों का प्रयोग करें। (9) नीचे लेटने पर अपनी टांगे ऊंची करके रखें या घुटनों को मोड़कर किसी एक ओर सोयें।

पीड़ादायक माहवारी के लिए डाक्टर से कब परामर्श लेना चाहिए?

पीड़ादायक महावारी
यदि स्व-उपचार से लगातार तीन महीने में दर्द ठीक न हो या रक्त के बड़े-बड़े थक्के निकलते हों तो डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए। यदि माहवारी होने के पांच से अधिक दिन पहले से दर्द होने लगे और माहवारी के बाद भी होती रहे तब भी डाक्टर के पास जाना जाहिए।

माहवारी से पहले की स्थिति के क्या लक्षण हैं?

माहवारी होने से पहले (पीएमएस) के लक्षणों का नाता माहवारी चक्र से ही होता है। सामान्यतः ये लक्षण माहवारी शुरू होने के 5 से 11 दिन पहले शुरू हो जाते हैं। माहवारी शुरू हो जाने पर सामान्यतः लक्षण बन्द हो जाते हैं या फिर कुछ समय बाद बन्द हो जाते हैं। इन लक्षणों में सिर दर्द, पैरों में सूजन, पीठ दर्द, पेट में मरोड़, स्तनों का ढीलापन अथवा फूल जाने की अनुभूति होती है।

पी.एम.एस. (माहवारी से पहले बीमारी) के कारण क्या हैं?

पी.एम.एस. का कारण जाना नहीं जा सका है। यह अधिकतर 20 से 40 वर्षों की औरतों में होता है, एक बच्चे की मां या जिनके परिवार में कभी कोई दबाव में रहा हो, या पहले बच्चे के होने के बाद दबाव के कारण कोई महिला बीमार रही हो- उन्हें होता है।

पी.एम.एस (माहवारी के पहले की बीमारी) का घर पर कैसे इलाज हो सकता है?

पी.एम.एस के स्व- उपचार में शामिल है- (1) नियमित व्यायाम - प्रतिदिन 20 मिनट से आधे घंटे तक, जिसमें तेज चलना और साईकिल चलाना भी शामिल है। (2) आहारपरक उपाय साबुत अनाज, सब्जियों और फलों को बढ़ाने तथा नमक, चीनी एवं कॉफी को घटाने या बिल्कुल बन्द करने से लाभ हो सकता है। (3) दैनिक डायरी बनायें या रोज का रिकार्ड रखें कि लक्षण कैसे थे, कितने तेज थे और कितनी देर तक रहे। लक्षणों की डायरी कम से कम तीन महीने तक रखें। इससे डाक्टर को न केवल सही निदान ढ़ंढने मे मदद मिलेगी, उपचार की उचित विधि बताने में भी सहायता मिलेगी। (4) उचित विश्राम भी महत्वपूर्ण है।

माहवारी के स्राव को कब भारी माना जाता है?

यदि लगातार छह घन्टे तक हर घंटे सैनेटरी पैड स्राव को सोख कर भर जाता है तो उसे भारी पीरियड कहा जाता है।

भारी माहवारी के स्राव के सामाय कारण क्या हैं?

भारी माहवारी स्राव के कारणों में शामिल है - (1) गर्भाषय के अस्तर में कुछ निकल आना। (2) जिसे अपक्रियात्मक गर्भाषय रक्त स्राव कहा जाता है। जिस की व्याख्या नहीं हो पाई है। (3) थायराइड ग्रन्थि की समस्याएं (4) रक्त के थक्के बनने का रोग (5) अंतरा गर्भाषय उपकरण (6) दबाव।

लम्बा माहवारी पीरियड किसे कहते हैं?

लम्बा पीरियड वह है जो कि सात दिन से भी अधिक चले।

लम्बेमाहवारी पीरियड के सामान्य के कारण क्या हैं?

(1)अण्डकोष में पुटि (2) कई बार कारण पता नहीं चलता तो उसे अपक्रियात्मक गर्भाषय रक्त स्राव कहते हैं (3) रक्त स्राव में खराबी और थक्के रोकने के लिए ली जाने वाली दवाईयां (4) दबाव के कारण माहवारी पीरियड लम्बा हो सकता है।

अनियमित माहवारी पीरियड क्या होता है?

अनियमित माहवारी पीरियड वह होता है जिसमें अवधि एक चक्र से दूसरे चक्र तक लम्बी हो सकती है, या वे बहुत जल्दी-जल्दी होने लगते हैं या असामान्य रूप से लम्बी अवधि से बिल्कुल बिखर जाते हैं।

किशोरावस्था के पहले कुछ वर्षों में अनियमित पीरियड़ होना क्या सामान्य बात है?

हां, शुरू में पीरियड अनियमित ही होते हैं। हो सकता है कि लड़की को दो महीने में एक बार हो या एक महीने में दो बार हो जाए, समय के साथ-साथ वे नियमित होते जाते हैं।

अनियमित माहवारी के कारण क्या है?

जब पीरियड असामन्य रूप में जल्दीर-जल्दी होते हैं तो उनके कारण होते हैं- (1) अज्ञात कारणों से इन्डोमिट्रोसिस हो जाता है जिससे जननेद्रिय में पीड़ा होती है और जल्दी-जल्दी रक्त स्राव होता है। (2) कभी-कभी कारण स्पष्ट नहीं होता तब कहा जाता है कि महिला को अपक्रियात्मक गर्भाषय रक्तस्राव है। (3) अण्डकोष की पुष्टि (4) दबाव।

सामान्य पांच दिन की अपेक्षा अगर माहवारी रक्त स्राव दो या चार दिन के लिए चले तो चिन्ता का कोई कारण होता है?

नहीं, चिन्ता की कोई जरूरत नहीं। समय के साथ पीरियड का स्वरूप बदलता है, एक चक्र से दूसरे चक्र में भी बदल जाता है।

भारी, लम्बे और अनियमित पीरियड होने पर क्या करना चाहिए?

(1) माहवारी चक्र का रिकॉर्ड रखें- कब खत्म हुए, कितना स्राव हुआ (कितने पैड में काम में आए उनकी संख्या नोट करें और वे कितने भीगे थे) और अन्य कोई लक्षण आप ने महसूस किया हो तो उसे भी शामिल करें। (2) यदि तीन महीने से ज्यादा समय तक समस्या चलती रहे तो डाक्टर से परामर्श करें।

माहवारी का अभाव क्या होता है?

यदि 16 वर्ष की आयु तक माहवारी न हो तो उसे माहवासी अभाव कहते हैं। कारण है- (1) औरत के जनन तंत्र में जन्म से होने वाला विकास (2) योनि (योनिच्छद) के प्रवेशद्वारा की झिल्ली में रास्ते की कमी (3) मस्तिष्क की ग्रन्थियों में रोग।
                                                                                                                                                                               

                                                                                                                                                                                  क्रमशः-----------

Wednesday, October 4, 2017

लिंग को मजबूत करना

  1. सुअर की चर्बी और शहद को बराबर मात्रा में एक साथ मिलाकर लिंग पर लेप करने से लिंग में मजबूती आती है।
  2. हींग को देशी घी में मिलाकर लिंग पर लगा लें और ऊपर से सूती कपड़ा बांध दें। इससे कुछ ही दिनों में लिंग मजबूत हो जाता है।
  3. भुने हुए सुहागे को शहद के साथ पीसकर लिंग पर लेप करने से लिंग मजबूत और शक्तिशाली हो जाता है।
  4. जायफल को भैंस के दूध में पीसकर लिंग पर लेप करने के बाद ऊपर से पान का पत्ता बांधकर सो जाएं। सुबह इस पत्ते को खोलकर लिंग को गर्म पानी से धो लें। इस क्रिया को लगभग 3 सप्ताह करने से लिंग पुष्ट हो जाता है।
  5. शहद को बेलपत्र के रस में मिलाकर लेप करने से हस्तमैथुन के कारण होने वाले विकार दूर हो जाते हैं और लिंग मजबूत हो जाता है।
  6. रीठे की छाल और अकरकरा को बराबर मात्रा में लेकर शराब में मिलाकर खरल कर लें। इसके बाद लिंग के आगे के भाग को छोड़कर लेप करके ऊपर से ताजा साबुत पान का पत्ता बांधकर कच्चे धागे से बांध दें। इस क्रिया को नियमित रूप से करने से लिंग मजबूत हो जाता है।
  7. बकरी के घी को लिंग पर लगाने से लिंग मजबूत होता है और उसमें उत्तेजना आती है।
  8. बेल के ताजे पत्तों का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर लगाने से लिंग में ताकत पैदा हो जाती है।
  9. धतूरा, कपूर, शहद और पारे को बराबर मात्रा में मिलाकर और बारीक पीसकर इसके लेप को लिंग के आगे के भाग (सुपारी) को छोड़कर बाकी भाग पर लेप करने से संभोग शक्ति तेज हो जाती है।
  10. असगंध, मक्खन और बड़ी भटकटैया के पके हुए फल और ढाक के पत्ते का रस, इनमें से किसी भी एक चीज का प्रयोग लिंग पर करने से लिंग मजबूत और शक्तिशाली बनता है।
  11. पालथ लंगी का तेल, सांडे का तेल़, वीर बहूटी का तेल, मोर की चर्बी, रीछ की चर्बी, दालचीनी का तेल़, आधा भाग लौंग का तेल, 4 भाग मछली का तेल को एकसाथ मिलाकर कांच के चौड़े मुंह में भरकर रख लें। इसमें से 8 से 10 बूंदों को लिंग पर लगाकर ऊपर से पान के पत्ते को गर्म करके बांध लें। इस क्रिया को लगातार 1 महीने तक करने से लिंग का ढीलापन समाप्त हो जाता है़, लिंग मजबूत बनता है। इस क्रिया के दौरान लिंग को ठंडे पानी से बचाना चाहिए।

जानकारी

लिंग की मालिश या लेप करते समय एक बात का ध्यान रखें कि लिंग के मुंह के नीचे सफेद रंग का बदबूदार मैल जमा हो जाता है। इस मैल को समय-समय ठंडे पानी से धोकर साफ करते रहने चाहिए।

मजबूत फौलादी शरीर बनाने के लिए प्रयोग करें हल्दी का ( पुनर्प्रकाशित लेख)

कैल्शियम हमारे शरीर के लिए एक बहुत ही जरुरी मिनरल है। जिसकी थौड़ी सी भी कमी हमें प्रोब्लम में डाल सकती है। अतः यह जरुरी है कि हम अपनी डाइट में पर्याप्त रुप से इसे रखें। वरना अनेक रोगों से ग्रसित होने के लिए तैयार रहें।

यह कैल्शियम ही है जो हमारे शरीर में हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है और हमारे दाँत भी कैल्शियम से ही निर्मित हैं। कैल्शियम की कमी हड्डियों को कमजोर बना कर रिकेट्स नामक रोग तो पैदा करती ही है साथ ही हमारी मसल्स में भी अकड़ाव के लिए कैल्शियम ही जिम्मेदार है। इसी की कमी से जब मसल्स अकड़ जाती हैं तो ज्वाइंट पैन शुरु हो जाता है और यह लगातार बना रह सकता है। कैल्शियम की कमी से महिलाओं में तो अनेकों रोग पैदा होते हैं क्योंकि एक युवा औरत को युवक से ज्यादा कैल्शियम की जरुरत होती है कई बार औरतें इसकी कमी को पूरा करने के लिए साधारण मिट्टी, मुल्तानी मिट्टी, खरिया मिट्टी भी खाती देखी जाती हैं। 
अतः यह जरुरी है कि हम अपनी डाइट में पर्याप्त रुप से कैल्शियम को शामिल करें।
 हल्दी पुराने समय से ही हमारी चिकित्सा पद्धति में प्रयोग होती रही है और खासकर हड्डियों व मसल्स के रोगों के लिए जानी जाती है थोड़ी सी भी चोट लगी हमारी माँ या दादी माँ तुरन्त ही हल्दी दूध के साथ लेने की सलाह देती सुनी जाती है अगर चोट खुली है तो हल्दी व तेल का बना मरहम लगा दिया जाता है और वाकई इसका कमाल का काम होता है। 
अतः आज पुनः पुराने प्रकाशित नुस्खे को ही नये शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूँ ।जिसके प्रयोग से न केवल आपकी हड्डियाँ मजबूत होंगी अपितु यह आपकी कैल्शियम की कमीे को पूरा करेगा।

सामग्री—

(1) हल्दीगाँठ 1 किलोग्राम
(2) बिनाबुझा चूना 2 किलो
नोट : – बिना बुझा चुना वो होता है जिससे सफेदी या कलई की जाती है।और डेली या पत्थर के रुप में प्राप्त होता है जिसे पानी डालकर बुझाया जाता है।
विधि –
सबसे पहले किसी मिट्टी के बर्तन में चूना डाल कर इसमें इतना पानी डाले की चूना पूरा पानी में डूब जाये। पानी डालते ही इस चूने में उबाल आने लगेगा । जब चूने में उबाल हल्का हो जाए तो इसमें हल्दी डाल कर किसी लकड़ी की सहायता से ठीक से मिक्स कर दे।
इस हल्दी को लगभग दो माह तक इसी चूने में पड़ा रहने दे। हाँ जब पानी सूखने लगे तो इसमें पुनःं पानी अवश्य मिला दिया करें की यह सूखने न पाए।
दो माह बाद हल्दी को निकाल कर ठीक से धो लें और सुखाकर पीस ले और किसी कांच के बर्तन में रख लें।

सेवन विधि

(1) वयस्क व्यक्ति के लिए इसकी 3 ग्राम मात्रा गुनगुने दूध में मिलाकर दिन में दो बार भोजन के बाद
(2)  और बच्चे के लिए 1 से 2 ग्राम मात्रा गुनगुने दूध में मिलाकर दिन में दो बार सुबह नाश्ते के बाद व साय को सोते समय भोजन के बाद

सेवन से लाभ

इस हल्दी का प्रयोग आपकी  कुपोषण, बीमारी व भोजन की अनियमितता व संतुलित मात्रा में न लिए गये पोषक तत्वों की पूर्ति में सहायक होगा जिसके कारण शरीर में कैल्शियम की कमी बहुत जल्दी दूर हो जाती है और शरीर में जोड़ों का  दर्द  भी ठीक हो जाता है।
बढ़ते बच्चों को अपेक्षाकृत अधिक कैल्शियम की जरुरत होती है यह नुस्खा बहुत ही अधिक लाभदायक है क्योंकि उनकी मिनरल्स की कमीं की पूर्ति करके उन्हैं पूर्णतः निरोगी बनाने में मदद करता है।यह एक ऐसा टाँनिक है जो आपके बच्चे का पूर्ण विकास करता है। यह नुस्खा टूटी हड्डी को जोड़ने व जोड़ों कमर व अन्य स्थानों पर हो रहे वात जनित दर्द में भी रामवाण का कार्य करता है। कई बार रात में सोते सोते कमर व गर्दन में एक ही तरफ लेटे रहने के कारण असहनीय पीड़ा होती है यह हल्दी वहाँ भी बहुत फायदा करके आपको जल्दी ही स्वास्थ्य लाभ कराती है।


हल्दी, फौलाद, मजबूत शरीर, कैल्सियम की पूर्ति

नारी जननांग अर्थात कामांग और कामतृप्ति

 जैसा कि आप सभी जानते होंगे कि सम्पूर्ण प्रकृति एक विशिष्ठ प्रकार के बल से बँधी है जिसे कहते है आकृषण का बल और इस आकृषण का प्रकटीकरण है काम  जिससे सम्पूर्ण प्रकृति आवद्ध है और काम क्रिया के निस्पादन के लिए प्रकृति ने सभी जीवधारियों में ही नही अपितु सम्पूर्ण कायनात को अलग अलग अंग प्रदान किये हैं जिससे कि आकृषण पैदा हो। मानव शरीर को भी प्रकृति ने नर व नारी दो रुपों में प्रकट किया है और दोनों ही शरीरों में  कुछ अंग एक दूसरे से विल्कुल अलग बनाए हैं। है दोनों शरीर मानव के ही किन्तु दोनों में ही विविधता है।दोनों ही शरीर एक दूसरे से अलग अपूर्ण हैं और दोनों के मिलन से ही पूर्णता सम्भव है या ये कहें कि दोनों का मिलन ही नयी प्रकृति बना सकने में समर्थ है। आज हम मानव शरीर के उसी अंग नारी रुप के बारे में विस्तार से बताऐंगें।यहाँ यह जानना बहुत जरुरी है कि

नारी के शरीर में अनेकों कामांग है जो कामतृप्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

महिलाओं के स्तनों की शारीरिक रचना

स्तन पुरुषों और महिलाओं दोनों में  होते हैं। महिलाओं में स्तन एक विशेष संरचना होती है जो एक स्रावी अंग के रुप में दूध स्राव्रित करते हैं वही  द्वितीयक यौन अंग के रूप में कार्य करते हैं।

महिला के स्तन  छाती के अग्र भाग के एक बड़े हिस्से को घेरते हैं जो अश्रु-ग्रंथि के आकार के समान होते हैं यह कॉलर बोन (हंसली) से शुरू होकर पसली की हड्डियों (दूसरी पसली से लेकर छठी या सातवीं पसली तक) तक जाते हैं। क्षैतिज रूप से, यह ब्रेस्टबोन (उरोस्थि) के किनारों से शुरू होकर कांख (बगल) तक फैले होते हैं। स्तन का आधार  गोलाकार होता है और इसकी माप लगभग 10-12 सेंटीमीटर होती है, लेकिन स्तन की आकृति और आकार परीवर्तनीय होता है।
Anatomy Of Female Breast स्त्री के स्तन की संरचना द लाइट आफ आयुर्वेद
स्त्री के स्तन की संरचना 
जन्म का विकास भ्रूण जीवन के छ्ठे सप्ताह से प्रारंभ होता है। जन्म के समय, स्त्री और पुरूष दोनों के स्तन समान दिखते हैं। यौवन के दौरान लड़कियों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन (हार्मोन) के कारण स्तन का विकास होता है।
आमतौर पर महिलाओं में दोनों स्तनों असममित होते हैं। एक स्तन दूसरे स्तन की तुलना में छोटा/बड़ा, ऊपर/नीचे स्थित या आकर में भिन्न हो सकता है।
युवा महिलाएँ जिन्होंने ने बच्चे को जन्म नहीं दिया है, उनके स्तन आमतौर पर गोलार्द्ध आकार के होते हैं; जबकि जिन महिलाओं के बच्चे हैं उनके स्तन चौड़े और लटके हुए होते हैं; बुजुर्ग महिलाओं के स्तन का आयतन कम हो जाता है और वे कम सुदृढ़, समतल और ढीले हो जाते हैं। स्तन का वजन 150—225 ग्राम तक हो सकता है, जबकि स्तनपान कराने वाली महिलाओं के स्तन (दूध से भरे हुए) का वजन 500 ग्राम से अधिक हो सकता है। निपल (वक्षाग्र) का आकार भी महिला दर महिला भिन्न होता है।

स्तन की संरचना

स्तन में ग्रंथियाँ, पुष्टिकारी संयोजी ऊतक और वसा, स्नायुबंधन, रक्त वाहिकाएँ, नसों और लसीका प्रणाली होती हैं।
स्तन चारों ओर से वसा की परत (वसा ऊतकों) से घिरा होता है, जो स्तन को मुलायम बनाते हैं।

स्तन के तीन मुख्य भागों में निम्न शामिल हैं:

  • दूग्ध ग्रंथियाँ (ग्लैनडुला मैमेरिया)
  • छोटा वृत्तीय क्षेत्र (एरोला मैमेई)
  • निपल (वक्षाग्र) (पैपिला मैमेरिया)
दुग्ध ग्रंथियाँ (पिण्डिका) या लोबी ग्लैंडुएले मैमेरिया: पंद्रह से बीस पिण्डिकाएँ वृत्तीय आकार में व्यवस्थित होती हैं जो संयोजी ऊतकों और वसा ऊतकों (वसा तंतु) द्वारा निर्मित विभाजनों द्वारा पृथक होती हैं। ग्रंथियों का कार्य दूध का उत्पादन करना है।
प्रत्येक पिण्डिका की मुख्य धमनी को लैक्टिफेरस डक्ट (डक्टस लैक्टिफेरी) कहा जाता है और ये प्र्थक रूप से वक्षाग्र में खुलती हैं। लैक्टिफेरस डक्ट दूध को पिण्डिका से वक्षाग्र में ले जाती है।
अरिओला यह निपल के चारों ओर स्थित भूरे या गुलाबी रंग का वृत्तीय क्षेत्र होता है, जिसमें अनेक तेल ग्रंथियाँ होती हैं जो अरिओला और निपल (वक्षाग्र) को ल्यूब्रिकेटेड और संरक्षित रखने में सहायता करती हैं।
निपल (वक्षाग्र) स्तन के बीच स्थित उभरा हुआ हिस्सा होता है जिससे दूध बाहर आता है।
वसा और संयोजी ऊतक: यह स्तन की ग्रंथियों और धमनियों को भरते और आच्छादित करते हैं। इनका कार्य स्तनों को रक्षित करना और आकार देना है।
अस्थिबंध: यह संयोजी ऊतकों का अस्थि-बंधन होती हैं, जो त्वचा से शुरू होकर स्तन से होते हुए छाती की मांसपेशी तक जाती है और इसका कार्य स्तन को समर्थन देना है।
तंत्रिकाएँ: स्तन के हिस्से में अनेक महत्वपूर्ण तंत्रिकाएँ होती हैं, जिसमें छाती और बाहु क्षेत्र में स्थित तंत्रिकाएँ शामिल होती हैं। संवेदी तंत्रिकाएँ भी होती हैं जो छाती और काँख की त्वचा में उपस्थित होती हैं। ये कथित उत्तेजना के लिए जिम्मेदार होती हैं।
रक्त वाहिकाएँ: अनेक रक्त वाहिकाएँ होने के कारण स्तन में रक्त का संचलन बेहतर होता है।
स्तन की लसीका प्रणाली: लसीका वाहिकाएँ रक्त वाहिकाओं के समान पतली नलिकाएँ होती हैं। लसीका एक साफ पीले रंग का द्रव होता है जो शरीर के ऊतकों को साफ करता है और पूरे शरीर में संचरित होता है और इसमें पोषक तत्व, श्वेत रक्त कोशिकाएँ और एंटीबॉडी (रोग-प्रतिकारक) होते हैं। इन छोटी नलिकाओं द्वारा स्तन से लसीका को छोटी सेम के आकार की संरचनाओं में ले जाया जाता है जिन्हें लसिका ग्रंथि कहा जाता है। लसीका ग्रंथि में अनेक  लिम्फोसाइट होते हैं (एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकाएँ) और इनका कार्य बाहरी कणों और सूक्ष्मजीवों को फ़िल्टर करना है और यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा होता है।
स्तन में लसीका ग्रंथि के चार समूह होते हैं:
  • सुपराक्लैविकुलर ग्रंथि – कॉलर बोन (हंसली) के ऊपर स्थित होती है
  • इंफ्राक्लैविकुलर (या सबक्लैविकुलर) ग्रंथियाँ – कॉलर बोन (हंसली) के नीचे स्थित होती हैं
  • कांख ग्रंथि – बगल (कांख) में स्थित होती है।
  • आंतरिक स्तन ग्रंथि – छाती के अंदर, उरोस्थि (ब्रेस्टबोन/ उरास्थि) के पीछे स्थित होती है
Anatomy of Female Breast नारी स्तन की संरचना
नारी कामांग और संरचना द लाइट आफ आयुर्वेद

स्तन के कार्य

स्तन का प्राथमिक कार्य शिशु को पिलाने के लिए दूध का उत्पादन, संग्रहण और उसे निर्मुक्त करना है। गर्भावस्था के दौरान, गर्भावस्था संबंधी हार्मोन द्वारा स्तन उभर जाते हैं और दूध का उत्पादन करने के लिए तैयार हो जाते हैं। प्रसव के बाद, महिलाओं के शारीर में हार्मोन बदलाव होते हैं जो दूध का उत्पादन करने के लिए दुग्ध ग्रंथियों को उत्तेजित करते हैं। धमनियों द्वारा दूध को ग्रंथि से निपल तक ले जाया जाता है। शिशु द्वारा निपल चूसने पर दूध निपल से स्रावित होता है।
स्तन द्वितीयक यौन अंग के रूप में भी कार्य करते हैं और महिलाओं को लैंगिक रूप से आकर्षित बनाने में भूमिका निभाते हैं।

स्त्री में कामांग (सेक्स संबधी अंग)- 

 मारी शरीर के अंग उसकी बनावट उसकी क्रिया विधि को समझ कर ही हम प्रकृति के बारे में समझ पाऐंगें कि आखिर ऐसा क्या होता है कि एक दूसरे से मिलन के लिए मानव के दोनों रुप तत्पर रहते है। 
नारी में कामांग दो प्रकार के होते हैं 

1- बाह्य स्त्री कामांग-

                 स्त्री के वाह्य कामांगों में  प्रमुख अंग है योनि व भगनासा
स्त्री के वाहरी अंगो के उपांगो में सबसे पहले आता है
योनि कपाट भग द्वार या योनिमुख- 
 यह  वड़े तथा छोटे ओष्ठों के बीच जाघों के मध्य होता है,इसके बाद कुछ अण्डाकार व कुछ अर्ध चन्द्राकार छेद होता है जिसे भग द्वार या योनिमुख कहते हैं।योनिमुख के दोनो ओर लम्बा सा उभार होता है जिस पर बाल उगे रहते हैं।
भगांकुर या clitoris -( काम भाव जाग्रत करने का मुख्य अंग)
इसमें अन्दर की  ओर चिकना व माँसल भाग होता है जिसे बडा  ओष्ठ या libia majora कहते हैं।जिसके दोनो सिरे आपस में मिले रहते रहते हैंऔर जहाँ ये ऊपर मिलते हैं वह संगम स्थल भगांकुर या clitoris कहलाता है।यही से मुख्यतः काम भाव जाग्रत होता है।इस भगांकुर की रचना कुछ कुछ पुरुष जननेन्द्रिय जैसी है।इसमे पुरुष जननेन्द्रिय की तरह ही हड्डियाँ या नसे नही होती यह भी थोड़ी सी रगड़ पाकर या फिर स्पर्श से तन कर फूल जाती है और स्त्री में कामोत्तेजना पैदा हो जाती है।यह बड़े ओष्ठ के मिलन स्थल से लगभग 1 या 1.25 सेमी. नीचे अन्दर की ओर होता है।
भगालिन्द या vestibulae--
भगांकुर के नीचे योनिमुख के ऊपर छोटे आष्ठों के बीच में एक तिकोनी सी जगह होती है जिसे भगालिन्द या vestibulae कहते हैं।इसके बीच में योनिमुख या छिद्र होता है यही मूत्रद्वार भी खुलता है।योनि के आरम्भ में दोनो ओष्ठों के पीछे एक ग्रंथि ढकी अवस्था में रहती है जो कामभाव पैदा करने के लिए उत्तरदायी है।भगालिंद से गर्भाशय तक फैला हुआ जिसके आगे की ओर मूत्राशय व पीछे की ओर का भाग मलाशय होता है के बीच मे योनिमार्ग स्थित रहता है।इसका मुख नीचे की अपेक्षा ऊपर को अधिक फैला हुआ रहता है।ऊपर की तरफ  इसमें गर्भाशय की गर्दन का योनि वाला भाग होता है।

2- आंतरिक स्त्री कामांग

 योनि या  Vagina---- 
प्रथम अंतः जनन अंग है यह एक15 सेमा.  लम्बी  नाली के जैसी संरचना है जो मांसपेशियों व झिल्ली से बनी होती है तथा जो योनिमुख से गर्भाशय द्वार तक जाती है।यह नाली योनि मुख पर व नाली के अंतिम सिरे पर तंग तथा बीच में चोड़ी होती है।यह तीन परतो वाली संरचना है तथा इसकी अगली व पिछली दीवारों पर खड़ी लकीरे पायी जाती हैं।इन लकीरों के मध्य में बहुत सी छोटी -2  ऐसी श्लैश्मिक ग्रंथियाँ होती हैं जिनसे संभोग के समय विशेष प्रकार के तरल स्राव निकल कर योनि को गीला और चिकना बनाते हैं तथा संभोग में मदद करते है।यह नाली जैसी संरचना संभोग,मासिक स्राव,व प्रसव की क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
        Uterus या गर्भाशय ---
   मूत्राशय और मलाशय के बीच में नीचे को मुँह  किये हुये नासपाती के समान थैली जैसी  एक संरचना  10×6  cm वाली पेड़ू मे पायी जाती है जिसे Uterus या गर्भाशय कहते हैं। इसका वजन लगभग 6 औंस के करीव होता है। इसके अन्दर ही गर्भ बनता है तथा यही उसका विकास होकर बच्चा विकसित होता है।गर्भाशय आठ वंधनो द्वारा अपने स्थान पर अवस्थित रहता है जिस प्रत्येक बंधन में दो तहें होती है इन्हीं तहों के बीच-2  में फैलोपियन ट्यूव,ओवरीज व गोल गोल लिगंमेट्स होता है।गर्भाशय को तीन भागों में विभाजित किया गया है।
1- गर्भाशय गर्दन (Cervix Uteri or Cervical canal)-----  
           
2- गर्भाशय( Body of Uterus)
गर्भाशय का भीतरी भाग गर्भगुहा कहलाता है।यह त्रिकोण के आकार का होता है।यौवनावस्था में यह 6.25 सेमी. का तथा गर्भावस्था में 22.से 30 सेमी. का हो जाता है।
अण्डाशय या डिंबग्रंथि (Ovaries)---
स्त्री के गर्भाशय के दोनो ओर रंग में सफेद तथा बादाम के आकार की अण्डाशय या डिंबग्रंथि (Ovaries)नामक दो ग्रंथियाँ होती हैं ये पुरुषों मे पाये जाने बाले अण्डकोशों के समान होती हैं।
स्त्री के जननागों की सक्षिप्त जानकारी हो जाने के बाद अब आप यह समझ सकते हैं कि जब इन अंगो मे कोई विकार पैदा हो जाए या इनकी क्रिया विधि गड़वड़ा जाए तभी संभोग क्रिया कष्टप्रद हो जाएगी 
अब स्त्रियों में होने बाले रोगों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

स्त्रियों में होने वाले सामान्य रोग योनि में खुजली हो जाना,योनि का तंग हो जाना,योनि का शिथिल या ढीली  हो जाना,योनि में घाव होना,जरायु या गर्भ प्रदाह, आदि  हैं।


Monday, October 2, 2017

सेक्स पॉवर बढ़ाने का बहुत ही बढ़िया फार्मूला है अश्वगंधा, जानिये इसके गुण व दोष

अश्वगंधा एक अनेक चमत्कारी गुण रखने वाली ऐसी औषधि है जो हजारों वर्षों से आयुर्वैदिक औषधि के रुप उपयोग की जाती रही है। यह आश्चर्यजनक रूप से लाभकारी औषधि है।अश्वगंधा का आयुर्वेद में  इसका बहुत ज्यादा उपयोग किया जाता हैा लैकिन इसका सही मात्रा में उपयोग करना ही फायदेमंद है।इसका एक सीमा तक हीं इसका उपयोग करना चाहिए।
तो आइए जानते हैं कि अश्वगंधा के प्रमुख गुण व दोषों के बारे में 
 अश्वगंधा के फायदे :

  1. अश्वगंधा का सेवन से Sex Power को बढ़ाता है। इसे खाने से वीर्य की गुणवत्ता बढ़ती है और वीर्य ज्यादा मात्रा में बनता है।
  2.  हमेशा आलस्य महसूस करने वाले लोगों के लिए अश्वगंधा बहुत फायदेमंद होता है। इसके सेवन से आलस्य खत्म हो जाता है.
  3.  सम्भोग के दौरान जल्दी थकाबट महसूस करने वाले लोगों के लिए यह एक बहुत हीं प्रभावशाली औषधी है।
  4. अश्वगंधा Anti Aging दवा है, अर्थात यह उम्र को नियंत्रित रखने में आपकी मदद करता है. जिससे व्यक्ति जल्दी बूढ़ा नहीं होता है. अर्थात इसके सेवन करने से समय से पहले बुढ़ापा नहीं आता है।
  5. यह मन को शांत करता है और और सहनशक्ति में वृद्धि करता है.
  6. यह हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ाता है। यह रोग प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है।
  7. अश्वगंधा अनिंद्रा की शिकायत दूर करता है।
  8. अश्वगंधा के सेवन से गठिया का दर्द खत्म हो जाता है।
  9. अश्वगंधा ब्लडप्रेशर को नियन्त्रण में रखता है।
  10.  इसे खाने से तनाव भी कम होता है।
  11. यह डायबीटीज में भी आपको काफी फायदा पहुंचाता है।
  12. अश्वगंधा पाचन तन्त्र के लिए भी बहुत अच्छा होता है।
  13. अश्वगंधा शरीर में आयरन को बढ़ा देता है. हर दिन तीन बार 1-1 gram सेवन करने से शरीर में खून की मात्रा बढ़ जाती है।
  14. इसे खाने से बालों का कालापन बढ़ जाता है.
  15. इससे महिलाओं की प्रजनन क्षमता बढ़ जाती है.
  16. जिन स्त्रियों की योनी से सफेद चिपचिपा पदार्थ निकलता है, उन्हें भी अश्वगंधा खाने से बहुत फायदा पहुंचाता है।
  17. टीबी में भी अश्वगंधा बहुत फायदा पहुंचाता है।
  18. अश्वगंधा याददाश्त में भी फायदा पहुंचाता है।
अश्वगंधा के कुछ नुकसान
  1. अश्वगंधा के ज्यादा सेवन से ज्यादा नींद आती है.
  2. जिन लोगों को अल्सर की समस्या हो उन्हें खाली पेट में या केवल अश्वगंधा कभी नहीं खाना चाहिए.
  3. किसी बीमारी के समय भी अश्वगंधा का सेवन कर रहें हों, तो यह दूसरे दवाओं के असर को क्षीण कर सकता है.
  4. जिन लोगों को अश्वगंधा खाने से बुखार हो जाता हो, उन्हें अश्वगंधा नहीं खाना चाहिए.
  5. गर्भवती स्त्रियों को अश्वगंधा का सेवन नहीं करना चाहिए.
  6. उन स्त्रियों को भी अश्वगंधा का सेवन नहीं करना चाहिये, जो अपने बच्चे को स्तनपान करा रही हों.
Note – अश्वगंधा के प्रयोग से पहले डॉक्टर की सलाह जरुर लें, अन्यथा यह आपको नुकसान भी पहुँचा सकता है.

Wednesday, May 31, 2017

ऐलर्जी नाशक नुस्खा - जो दूर कर सकता है आपके शरीर की गर्मी, एलर्जी व शीत पित्त

ऐलर्जी नाशक नुस्खा - जो दूर कर सकता है आपके शरीर की गर्मी, एलर्जी व शीत पित्त 




आजकल जन सामान्य किसी न किसी प्रकार की एलर्जी से निम्नलिखित प्रयोग हर तरह की एलर्जी को समूल नष्ट करने की शक्ति रखता है।एलर्जी व शीतपित्त इत्यादि रोगों के लिए शास्त्रोक्त हरिद्रा खण्ड अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है।लेकिन निम्नलिखित नवीन प्रयोग उससे भी बहेतर है।


योग- पवित्र गंगाजल-1 लीटर


पिसी हुई मिश्री – 400 ग्राम


हल्दी का महीन चूर्ण – 300 ग्राम


शुद्ध स्वर्ण गैरिक – 200 ग्राम


मुलहठी का महीन चूर्ण – 100 ग्राम


निर्माण विघि- हल्दी, स्वर्ण गैरिक (सोना गैरु) तथा मुलहठी का चूर्ण आपस में खूब मिला लें । बडें खरल में डालकर वस्त्र से छना गंगाजल से घुटाई करें।कुछ दिनों बाद जब मिश्रण विल्कुल सूख जाए तब उसमें पिसी हुयी मिश्री डालकर सुरक्षित रखें।इस दवा का 1 -1 छोटे चम्मच मात्रा प्रतिदिन दिन में तीन बार स्वच्छ जल से 3 बार लेने से किसी भी प्रकार की एलर्जी ,शीतपित्त, रक्तविकार, शरीर की बढ़ी हुयी गर्मी दूर हो जाती है।

Tuesday, May 30, 2017

पुरुषों काम तृप्ति वाहक पुरुष जनन अंगों की जानकारी

पिछले अंको में मैने आपको नारी जनन अंगो की जानकारी प्रदान की थी शायद आप उससे सन्तुष्ट हुऐ होंगे। और उस जानकारी को देने की शुरुआत में हमने आपसे वायदा किया था कि हम आपको पुरुष जनन अंगो की भी जानकारी देगें।सो जानकारियाँ लेकर हम अपने वायदानुसार प्रकट हो गये हैं।
नारियों के समान ही प्रभु ने पुरुष के शरीर में भी अपनी कारीगरी का भरपूर प्रयोग किया है।और उन्हौने हमे अंग प्रदान करते समय ही उनकी देखभाल की भी हिदायत दी है किन्तु मानव ने जैसे अन्य प्राणियों का प्रयोग अपने मतलब से किया है । उसी प्रकार खुद अपने शरीर को भी न वख्स कर उसका भी दुर्पुयोग करने में नही हिचक रहा है। और जब स्वयं रोगी हो जाता है तो फिर अपने किये पर पछताता है।और फिर भगवान को दोष देता है।लैकिन भगवान ने तो सभी को यह नैमत वख्सी है किसी को छोड़ थोड़े ही दिया है।अब आगे की बात करते हैं।किसी भी रोग के इलाज से पहले आपको अपने या रोगी के अंगो की जानकारी व क्रिया विधि की जानकारी होना बहुत ही आवश्यक है।
पुरुष जननांग निम्न अंग व अंग तंत्रो को सम्मिलित करते हैं।

खांसी,जुकाम,एलर्जी, और सर्दी का आयुर्वेदिक घरेलू उपचार

खांसी,जुकाम,एलर्जी, और सर्दी का आयुर्वेदिक घरेलू उपचार

सर्दी, खांसी और जुखाम मानवता को सबसे अधिक प्रताड़ित करने वाले रोग हैं, जो वर्ष में कई कई बार जब भी मौसम की संध्याऐं अर्थात मिलान होता है तभी अपना आक्रमण कर देते हैं।इनके साथ खासियत यह भी है कि ये सभी एक ही  परिवार के रोग है अतः एक से परिवार के होने के कारण इनकी औषधियाँ भी लगभग एक सी होती हैं।

आज मैं आपको एसे आसान से नुस्खे यहाँ प्रस्तुत कर  रहा हूँ जिन्हैं आप घर पर ही बनाकर प्रयोग कर सकते हैं और ये सभी योग आयुर्वेदिक होने के कारण आपको कोई  एलोपेथी दवाओं जैसे  साइड इफेक्ट भी नहीं होंगे।

आयुर्वेदिक योग :- खांसी,जुकाम,एलर्जी सर्दी आदि के लिए घरेलूआयुर्वेदिक योग ============


मैं आपको ऐसा आयुर्वेदिक योग बता रहा हूँ जिसे आप घर पर बना सकते हैं, इसके लिए आपको चाहिए

1- तुलसी का काढ़ा  

     निर्माण सामिग्री---- 

तुलसी का काढ़ा  www.ayurvedlight.com

तुलसी का काढ़ा

तुलसी के पत्ते, तना और बीज तीनो का कुल वजन 50 ग्राम इसके लिए आप तुलसी को किल्ली सहित ऊपर से तोड़ लें इसमें बीज, तना और तुलसी के पत्ते तीनो आ जाएंगे इनको एक बर्तन में ले कर इसमें 500 मिली लीटर या आधा लीटर पानी डाल ले और इसमें 100 ग्राम अदरक और 20 ग्राम काली मिर्च दोनों को पीस कर डाले और अच्छे से उबाल कर काढा बनाने रख दें और जब पानी 100 ग्राम रह जाए तो इसे छान कर किसी काँच की बोतल में डाल कर रखे इसमे थोड़ा सा शहद मिला कर आप इसको दो चम्मच  मात्रा में दिन में 3 बार ले सकते है। 


जुकाम के लिए------

 2 चम्मच अजवायन को तवे पर हल्का भूने और फ़िर उसे एक रूमाल या कपडे में बांध ले और पोटली बना ले उस पोटली को नाक से सूंघे और सो जाए.

खांसी के लिए ------ कालीमिर्च व शहद की चटनी का प्रयोग--- 

खांसी के लिए ------ कालीमिर्च व शहद की चटनी का प्रयोग



खांसी के लिए ------ कालीमिर्च व शहद की चटनी का प्रयोग
  • प्रतिदिन में 3 बार हल्के गर्म पानी लेकर उसमें आधा चम्मच सैंधा नमक डाल कर गरारे करें।
  • सुबह उठने के बाद, दोपहर को और रात को सोने से पहले एक चम्मच शहद लेकर उसमें थोड़ी सी पिसी हुई काली मिर्च का पाऊडर डाल कर मिलाकर  चाटें
  • अगर खासी ज्यादा आ रही हो तो 2 साबुत काली मिर्च के दाने और थोडी सी मिश्री मुंह में रख कर चूसे आपको आराम मिलेगा.



चमत्कारी सूर्य तेल, घर पर बनाएं--- हृदय रोग से मुक्ति पायें।

हमारी सृष्टि के आदि देव हैं सूर्य जो सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करते हैं और करते हुये हमें दिखाई भी देते हैं।इन्हीं के कारण हम इस पृथ्वी पर जीवन की कल्पना कर पाते हैं। सभी प्राचीन सभ्यताओं में सूर्य देव को भगवान का दर्जा दिया गया था फिर चाहें वो प्राचीन यूनान की सभ्यता हो, वेवीलोन की , मेसोपोटामिया की या फिर चीन की लैकिन हम कहीं के बारे में बात न करें तो हमारे भारत वर्ष में तो भगवान सूर्य की महिमा को सर्वाधिक महत्व दिया ही गया है। 
भारतीय ज्योतिष शास्त्र में तो सूर्य का स्थान सर्वोपरि है क्योंकि सारे ग्रह सूर्य के इर्द गिर्द ही चक्कर लगाते हैं और सर्वाधिक प्रभाव भी उन्हीं का सम्पूर्ण कुण्डली पर पड़ता है उन्हीं के कारण कोई भी ग्रह अस्त हो जाता है। और उनकी रश्मियाँ कम तीव्र होने पर ही उदित हो पाता है।और जब हम कुण्डली की बात कर ही रहे हैं तो कई लोगों की कुण्डली में सूर्य ग्रह से पीड़ा भी हो सकती है। अतः भगवान भास्कर सूर्य नारायण स्वयं अपनी पीड़ा से शान्ति का उपाय भी जातक को प्रदान करते हैं। यह उपाय अचूक है जो न केवल कुण्डली के सूर्य दोष का शमन करता है अपितु सामान्य जातक भी अगर इस तेल के उपयोग से लाभान्वित हो सकता है। अतः यह कहा जा सकता है कि यह तेल वास्तव में सम्पूर्ण मानव जाति के लिए भगवान भास्कर का वरदान ही है। 
और तो और यह तेल हृदय रोग की भी रामवाण औषधि है। आयुर्वेदिक ग्रंथो में भी सूर्य चिकित्सा के अन्दर इस योग का उल्लेख मिलता है।

सूर्य तेल बनाने की विधि

सूर्य तेल बनाने के लिए 200 ग्राम सूरजमुखी व 200 ग्राम तिल का तेल लें। अब इसमें 4 ग्राम लौंग व 8 ग्राम केशर मिलाएं। औरइन सभी चीजों को लाल रंग की कांच की बोतल में रखें।
यदि काँच की लाल बोतल उपलब्ध न हो तो सफेद काँच की बोतल में रखकर लाल रंग की पन्नी या सेलोफेन कागज लपेट दें इस प्रकार लपेट कर इस बोतल को सम्पूर्ण सामिग्री सहित 15 दिनों के लिए खुली धूप में रखते रहैं। और शाम को वहाँ से हटा दें। इस प्रकार 15 दिनों की धूप प्राप्त कर यह तेल अपने अन्दर चमत्कारिक गुण प्राप्त कर लेगा जो आपके कुण्डली कृत दोषों को तो दूर करेगा ही जिन जातकों को हृदय रोग की समस्याऐं भी हैं उनका भी शमन करके उन्हैं स्वास्थ्य लाभ कराऐगा। उच्चरक्त चाप से पीड़ित अर्थात हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए पूरे शरीर पर तेल की मालिश करनी चाहिये। छोटे बच्चों के लिए मालिश करने के लिए यह सूर्य तेल किसी चमत्कार से कम नही होगा क्योंकि इसमें अन्य किसी भी तेल की अपेक्षा अधिक विटामिन डी पाया जाता है। 

सामान्य लोगों द्वारा जब तेल की मालिश सम्पूर्ण शरीर पर की जाती है तो उनकी कान्ति को बढ़ाता है जिससे आपके सौन्दर्य में चार चाँद लग जाते है।

सूर्य तेल को उपयोग करने की विधि---

सूर्य तेल चूँकि सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है और हमारे हिन्दू या अग्रेजी किसी भी कलेन्डर के मुताविक रविवार ही सूर्य का प्रतिनिधि दिन है अतः सूर्य तेल के प्रयोग की शुरुआत के लिए भी यही दिन सर्वाधिक उपयुक्त है। 

प्रत्येक दिन सूर्य तेल के उपयोग से आप सूर्य कृत दोषों से मुक्ति तो पाते ही हैं इसके अलाबा आपका शरीर कान्तिवान होता है आपके शरीर से हाई ब्लड प्रेशर व हृदय रोग के दोष भी मुक्त हो जाते है।वैसे तो यह तेल प्रतिदिन ही लगाना चाहिये किन्तु जिन लोगों को सुबिधा न हो वे प्रति सप्ताह में रविबार को तो इसे अवस्य ही इस्तेमाल कर सकते हैं। 
नोट- कृपया इस तेल को प्रयोग करने से पहले किसी ज्योतिषी को अपनी कुण्डली दिखा लें तो ज्यादा उपयुक्त रहेगा। 

प्राकृतिक सौन्दर्य प्रसाधन है मुल्तानी मिट्टी

आज से बीस पच्चीस बर्ष पहले तक गाँवो में महिलाऐं ही नही अपितु सम्पूर्ण जन समाज के बीच मुल्तानी मिट्टी नहाने में बहुत काम आती थी। किन्तु आजकल की बाजारु चमक ने पुराने प्राकृतिक औषधीय वस्तुओं के प्रयोग से समाज का ध्यान वँटा दिया है जिसके कारण आज समाज में अनेको रोग पैदा हो रहैं है एसे में जरुरत है कि इन बाजारु चीजों से दूर होकर पुनः प्रकृति की गोद में बैठा जाऐ जहाँ हम महफूज रह सके और महफूज रह सके हमारा अपना अमूल्य स्वास्थ्य और हम बने रहें जीवन के अंत तक निरोगी। मुल्तानी मिट्टी त्वचा की सुंदरता बढ़ाने के लिए  एक ऐसा नुस्खा है, जिसका उपयोग

प्राकृतिक सौन्दर्य प्रसाधन है मुल्तानी मिट्टी

सभी लड़कियां कर सकती हैं। त्वचा किसी भी तरह की हो या फिर त्वचा की कोई भी समस्या हो, मुल्तानी मिट्टी बहुत फायदेमंद है। इस गुणकारी मिट्टी का उपयोग सबसे ज्यादा सौंदर्य प्रसाधन के रूप में किया जाता है. मुल्तानी मिट्टी चेहरे पर लगाने से त्वचा गहराई से साफ हो जाती है और रंगत भी निखर जाती है. वहीं बालों को डीटॉक्स करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है.

मुल्तानी मिट्टी त्वचा को बहुत सारे फायदे पहुंचाती है. इसके इस्तेमाल से त्वचा से जुड़ी लगभग हर समस्या दूर हो जाती है. इसे गुलाब जल या फिर टमाटर के रस में मिलाकर लगाने से आपकी त्वचा सुंदर और स्वस्थ बनी रहती है. आइए जानते हैं इससे होने वाले फायदे.

चेहरे को चमकदार बनाती है
अगर आपकी त्वचा अपनी प्राकृतिक चमक खो चुकी है और आप इसे वापस लाने के तमाम उपाय करके थक चुकी हैं तो मुल्तानी मिट्टी का उपयोग करें. त्वचा को चमकदार बनाने के लिए मुल्तानी मिट्टी में चंदन पाउडर और टमाटर का रस मिलाकर लगाएं और सूखने पर गर्म पानी से धो लें. इससे आपकी त्वचा की प्राकृतिक चमक लौट आएगी.

त्वचा की कोमलता लौटाए
अगर आप अपनी रूखी त्वचा से परेशान हैं तो रात में कुछ बादाम दूध में भिगोकर रखें. सुबह इन्हें पीसकर मुल्तानी मिट्टी और दूध के साथ मिलाकर फेसपैक तैयार करें और चेहरे पर लगाएं. सूखने पर ठंडे पाने से धो लें. इससे आपकी त्वचा नर्म और मुलायम बन जाएगी.

ऑयली त्वचा के लिए
अगर आप ऑयली त्वचा की चिपचिपाहट से परेशान हैं और बार-बार चेहरा धोने पर भी ये समस्या खत्म नहीं होती तो मुल्तानी मिट्टी का उपयोग करें. इसके लिए गुलाब जल के साथ मुल्तानी मिट्टी मिलाकर फेसपैक तैयार करें और रोज चेहरे पर लगाएं.

टैनिंग हटाने के लिए
गर्मियों के मौसम में त्वचा की टैनिंग एक आम समस्या है और आपकी इस समस्या का हल भी मुल्तानी मिट्टी ही है. इसके लिए मुल्तानी मिट्टी, नारियल तेल और शक्कर मिलाकर चेहरे पर लगाएं और थोड़ी देर बाद हल्के हाथों से रगड़कर इसे निकालें. धीरे-धीरे त्वचा की टैनिंग चली जाएगी.

एलर्जी कारण व आयुर्वेदिक निवारण Allergy Ke Karan, Lakshan, ilaj, Dawa Aur Upchar

एलर्जी क्या है इसके लक्षण,कारण,उपचार,दवा व इलाज तथा परहेज के बारे में जानिये Allergy Ke Karan, Lakshan, ilaj, Dawa Aur Upchar in Hindi
Allergy Ke Karan, Lakshan, ilaj, Dawa Aur Upchar in Hindi

Allergy Ke Karan, Lakshan, ilaj, Dawa Aur Upchar in Hindi

शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमत जब कुछ बाहरी तत्वों, जैसे पराग कण, धूल, भोजन इत्यादि के प्रति  कुछ कम हो जाती है तो उसे हम वैज्ञानिक भाषा में एलर्जी कहते हैं।आज पूरे विश्व में यह रोग तेजी से फैल रहा है।और हालात यहाँ तक हो चुके हैं कि  युवा अवस्था एवं बाल्यावस्था में भी एलर्जी रोग देखने में आ रहा है। एलर्जी करने वाले तत्वों को एलरजेन कहा जाता है। ये एलरजेन या एलर्जी पैदा करने वाले तत्व वास्तव में कोई हानिकारक कीटाणु या विषाणु नहीं बल्कि अहानिकर तत्व ही होते हैं, जैसे पानी, गेहूं, बादाम, दूध, पराग कण या वातावरण में मौजूद कुछ प्राकृतिक तत्व। यही कारण है कि सभी लोगों को ये हानि नहीं पहुंचाते। एक ही घर में, एक ही प्रकार के वातावरण से एक व्यक्ति को एलर्जी होती है तो दूसरे को नहीं। 

आखिर क्या कारण होता है एलर्जी का? क्यों किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति हानिकारक प्रतिक्रिया करती है?

आयुर्वेदानुसार एक स्वस्थ व्यक्ति में वात पित्त व कफ साम्य अवस्था  में होते हैं। इसी कारण उनकी रोग प्रतिरोध शक्ति किसी एलरजेन के सम्पर्क में आकर भी किसी प्रकार की  प्रतिक्रिया  अर्थात एलर्जी पैदा नहीं करती है। जब ये त्रिदोष साम्यावस्था में  रहते हैं तो हमारे शरीर की ओज शाक्ति उत्तम होती है। और जब उत्तम ओज होता है तो किसी प्रकार की ऐलर्जी या रोग हो ही नही सकता या कहैं कि प्रतिरोधक क्षमता होने पर कोई रोग शरीर पर टिक ही नही सकता है, यानि उत्तम रोग प्रतिरोधक शक्ति हमारे शरीर से नियमित रूप से हानिकारक तत्वों को निष्कासित करती है और इसी कारण कोई भी बाहरी तत्व उसमें किसी प्रकार की प्रतिक्रिया कर ही नही सकता।

आयुर्वेदानुसार एलर्जी का मूल कारण है आपकी असामान्य पाचक अग्नि, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता,और दोषों की विषमता। इसमें भी अधिक महत्व पाचक अग्नि का माना गया है। जब पाचक अग्नि से भोजन का सही रूप पाक नहीं हो पाता है तो भोजन अधपचा रहता है। इस अधपके भोजन से एक चिकना विषैला पदार्थ पैदा होता है जिसे ‘आम’ कहते हैं। यह आम ही एलर्जी का मूल कारण होता है। यदि समय रहते इस आम का उपचार नहीं किया जाए तो यह आतों में जमा होने लगता है और पूरे शरीर में भ्रमण करता है। जहां कहीं इसको कमजोर स्थान मिलता है वहां जाकर जमा हो जाता है और पुराना होने पर आमविष कहलाता है। आमविष हमारी ओज शक्ति को दूषित कर देता है। इसके कारण, जब कभी उस स्थान या अवयव का सम्पर्क एलरजेन से होता है तो वहां एलर्जी प्रतिक्रिया होती है।

यदि आमविष त्वचा में है तो एलरजन के सम्पर्क में आने से वहां पर खुजली, जलन, आदि लक्षण होते है, यदि आमविष श्वसन संस्थान में है तो श्वास कष्ट, छीकें आना, नाक से पानी गिरना, खांसी इत्यादि और यदि पाचन संस्थान में है तो अतिसार, पेट दर्द, अर्जीण आदि लक्षण होते हैं।

पाचक अग्नि के अतिरिक्त वात, पित्त, कफ के वैषम्य से भी प्रतिरोधक क्षमता क्षीण एवं दूषित हो जाती है जिसकी वजह से एलर्जी हो सकती है। इसके अलावा तनाव, नकारात्मक सोच, शोक, चिन्ता आदि भी हमारे पाचन पर असर डालते हैं, जिससे आँव पैदा होता है। इसलिए कुछ लोगों में एलर्जी का मूल कारण मानसिक विकार भी माना गया है। इसके अतिरिक्त कई बार एलर्जी रोग को अनुवांशिक यानि हैरीडिटीकल भी माना गया है। क्योंकि कुछ लोगों में जन्म से ही पाचक अग्नि एवं प्रतिरोधक क्षमता क्षीण या कमजोर होती है।

आयुर्वेदिक उपचार

आयुर्वेद में एलर्जी का सफल इलाज है। आयुर्वेदिक उपचार रोग के मूल कारण को नष्ट करने में सक्षम होने के कारण रोग को जड़ से ठीक करता है। एलर्जी के उपचार में आमविष के निस्कासन के लिए औषधि दी जाती है। इसलिए सर्वप्रथम शोधन चिकित्सा करते हैं, जिससे शरीर में जमे आम विष को नष्ट किया जाता है। इसके अतिरिक्त दोषों एवं धातुओं को साम्यावस्था में लाकर ओज शक्ति को स्वस्थ बनाया जाता है। यदि रोगी मानसिक स्तर पर अस्वस्थ है तो उसका उपचार किया जाता है और एलर्जी के लक्षणों को शान्त करने के लिए भी औषधि दी जाती है।

उचित उपचार के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श लें और उनके द्वारा दी गई। औषधियों का नियमित रूप से सेवन करें। रोग पुराना एवं कष्ट साध्य होने के कारण ठीक होने में कुछ समय लेगा, इसलिए संयम के साथ चिकित्सक के परामर्शनुसार औषधियों एवं आहार-विहार का सेवन करें। यदि आप एलर्जी से पीड़ित हैं तो औषधियों के साथ-साथ निम्न उपचारों के प्रयोग से भी आपको लाभ मिलेगा।

जानें एलर्जी के लक्षण, कारण, उपचार इलाज और परहेज के तरीकों के बारे में | jane Allergy Ke Karan, Lakshan, ilaj, Dawa Aur Upchar Hindi Me


घरेलू उपचार

पानी में ताजा अदरक, सोंफ एवं पौदीना उबालकर उसे गुनगुना होने पर पीयें।, इसे आप दिन में 2-3 बार पी सकते हैं। इससे शरीर के स्रोतसों की शुद्धि होती है एवं आम का पाचन होता है।

लघु एवं सुपाच्य भोजन करें जैसे लौकी, तुरई, मूंग दाल, खिचड़ी, पोहा, उपमा, सब्जियों के सूप, उबली हुई सब्जियां, ताजे फल, ताजे फलों का रस एवं सलाद इत्यादि। सप्ताह में एक दिन उपवास रखें, केवल फलाहार करें। नियमित रूप से योग और प्राणायाम करें। रात को सोते समय एक चम्मच त्रिफला चूर्ण लें और हर रोज एक बड़ा चम्मच च्यवनप्राश लें।

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Monday, May 29, 2017

बच्चों की शादी करने से पहले कुण्डली मिलान एक अति आवश्यक व अति महत्वपूर्ण कार्य

कुण्डली मिलान विवाह से पहले क्यों जरुरी है?



हिन्दु संस्कृृति विश्व की महानतम सभ्यता व संस्कृति है जिसमें व्यक्ति के जीवन का वैज्ञानिक तरीके से अवलोकन कर जीवन जीना व जीवन के बाद में मोक्ष प्राप्त होना तक निहित किया गया है हमारे जीवन में हमारे जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त कुल सोलह संस्कार हैं जिनसे होकर जो व्यक्ति ठीक ठीक प्रकार जीवन जीता है वह वास्तव में सुखानुभूति करता है। इन्ही सोलह संस्कारों में एक संस्कार है विवाह जिसका अनुकरण करके ही वास्तव में जीवन की शुरुआत होती है जब जीवन साथी जीवन में आ जाता है व्यक्ति अब युगल कहलाते हैं । यहीं से जीवन की वास्तविक शुरुआत होती है अतः यह ध्यान देने की बात है कि शुरुआत में बड़ा ही सोच समझकर कदम रखा जाऐ नही पूरा जीवन समस्याग्रस्त हो सकता है।
 इस सब में माता पिता का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है क्योंकि बिना शादी किये लड़का या लड़की ज्यादातर परिपक्व नही होते हैं और बिना परिपक्वता के जीवन का महत्वपूर्ण निर्णय लेना उनके शायद ही बस में होता है अतः इन निर्णयों में निश्चित ही माता पिता व घर के बड़ों का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहता है।

              हमारे धार्मिक जीवन में विवाह एक सामान्य संस्था नही है अपितु बहुत ही महत्वपूर्ण संस्था है जिसका अस्तित्व केवल एक या दो साल के लिए नही अपितु संपूर्ण जीवन के लिए होता है । अतः जरुरी है कि हर प्रकार से हर रास्ते से इस रिस्ते पर ध्यान देने के बाद ही इस संबंध को जारी किया जाऐ ।ज्योतिष व्यक्ति के जीवन का आइना दिखाता है क्योंकि व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके जन्म समय पर बैठे ग्रहों की चाल पर आधारित होता है अतः जरुरी है कि इस महत्वपूर्ण विषय का निर्णय करते समय ज्योतिष का सहयोग लिया जाऐ और अपने जीवन के सपनों को साकार किया जाऐ। ज्योतिष आपके लिए उचित ही नही सर्वाधिक उपयुक्त जीवन साथी की तलाश कर सकता है। लैकिन जरुरी है कि आप कुण्डलियों का मिलान ज्योतिष के नियमों के आधार पर सही ज्योतिषी से कराये।जो विना किसी लोभ लालच के आपका सहयोग करे।ये न हो कि पैसे के लालच में आपके गलत निर्णय पर ही हामी भर दे। ज्यादातर एसा होता है कि पंडित जी के पास जाकर व्यक्ति उन्हैं कहता है पंडित जी हमने लड़की या लड़का देख लिया है बहुत अच्छा घर है परिवार है घर का उसका मकान है उसकी जॉव भी बहुत अच्छी है बस आप शादी बना दें पंडित जी भी देखते हैं कि मेरा क्या जाता है अगर मना करुंगा तो यह व्यक्ति कहीं और चला जाऐगा और मेरे जो शादी आदि में रुपये बनने हैं वे भी नही मिल पाऐंगे अतः कुण्डली न मिलने पर भी पंडित जी हाँ कर देते हैं लैकिन ऐसे में किसी अन्य का नही अपितु अपने बच्चों का जीवन ही अंधकार से भर जाता है।बच्चों के युवा होते ही माता-पिता को उनके विवाह की चिंता सताने लगती है। विवाह का विचार मन में आते ही जो सबसे बड़ी चिंता माता-पिता के समक्ष होती है वह है अपने पुत्र या पुत्री के लिए योग्य जीवनसाथी की तलाश। इस तलाश के पूरी होते ही एक दूसरी चिंता सामने आ खड़ी होती है, वह है भावी दंपत्ति की कुंडलियों का मिलान जिसे ज्योतिष की भाषा में कुण्डली मिलाना कहा जाता है। प्राचीन समय में कुंडली-मिलान अत्यावश्यक माना जाता था।

वर्तमान सूचना और प्रौद्यागिकी के दौर में कुण्डली मिलान केवल एक रस्म अदायगी बनकर रह गया है। ज्योतिष शास्त्र ने कुण्डली मिलान  में अलग-अलग आधार पर गुणों की कुल संख्या 36 निर्धारित की है जिसमें 18 या उससे अधिक गुणों का मिलान विवाह के लिए अति आवश्यक होता है।
लेकिन केवल गुणों की संख्या के आधार पर दाम्पत्य सुख निश्चय कर लेना उचित नहीं है। अधिकतर देखने में आया है कि 18 से ज्यादा गुणों के मिल जाने के उपरान्त भी दंपत्तियों के मध्य दाम्पत्य सुख का अभाव पाया गया है। इसका मुख्य कारण है कुण्डली मिलान  को मात्र गुण आधारित प्रक्रिया समझना जैसे .यह कोई परीक्षा हो। जिसमें न्यूनतम अंक पाने पर विद्यार्थी उत्तीर्ण नही तो 1-2 अंक कम आने से अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता है। ज्योतिष इतना सरल व संक्षिप्त विषय नहीं है।
गुण आधारित कुण्डली मिलान की यह विधि पूर्णतया ठीक नहीं माना जा सकता  है। या यह कह सकते हैं कि कुण्डली मिलान से विवाह पूर्णतः समस्या मुक्त हो गया है यह नही कहा जा सकता है हाँ यह अवस्य़ है कि यह कुण्डली मिलान की पहली सीढ़ी पार कर गया है ।
 विवाह में कुंडलियों का मिलान करते समय गुणों के अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण बातों का भी विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। भले ही गुण निर्धारित संख्या की अपेक्षा कम मिलें हो परन्तु दाम्पत्य सुख के अन्य कारकों से यदि दाम्पत्य सुख की सुनिश्चितता होती है तो विवाह करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। आइए जानते हैं कि कुण्डली मिलान  करते या करवाते समय गुणों के अतिरिक्त किन विशेष बातों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है।
विवाह का उद्देश्य गृहस्थ आश्रम में पदार्पण के साथ ही वंश वृद्धि और उत्तम दाम्पत्य सुख प्राप्त करना होता है। प्रेम व सामंजस्य से परिपूर्ण परिवार ही इस संसार में स्वर्ग के समान होता है। इन उद्देश्यों की पूर्ति की संभावनाओं के ज्ञान के लिए मनुष्य के जन्मांग चक्र में कुछ महत्वपूर्ण कारक होते हैं।
ये कारक हैं-सप्तम भाव एवं सप्तमेश, द्वादश भाव एवं द्वादशेश, द्वितीय भाव एवं द्वितीयेश, पंचम भाव एवं पंचमेश, अष्टम भाव एवं अष्टमेश के अतिरिक्त दाम्पत्य का नैसर्गिक कारक ग्रह शुक्र (पुरुषों के लिए) व गुरु (स्त्रियों के लिए)।

सप्तम भाव एवं सप्तमेश-----

दाम्पत्य सुख प्राप्ति के लिए सप्तम भाव का विशेष महत्व होता है। सप्तम भाव ही साझेदारी का भी होता है। विवाह में साझेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अतः सप्तम भाव पर कोई पाप ग्रह का प्रभाव नहीं होना चाहिए। सप्तम भाव के अधिपति का सप्तमेश कहा जाता है। सप्तम भाव की तरह ही सप्तमेश पर कोई पाप प्रभाव नहीं होना चाहिए और ना ही सप्तमेश किसी अशुभ भाव में स्थित होना चाहिए।

द्वादश भाव एवं द्वादशेश------

सप्तम भाव के ही सदृश द्वादश भाव भी दाम्पत्य सुख के लिए अहम माना गया है। द्वादश भाव को शैय्या सुख का अर्थात्‌ यौन सुख प्राप्ति का भाव माना गया है। अतः द्वादश भाव एवं इसके अधिपति द्वादशेश पर किसी भी प्रकार के पाप ग्रहों का प्रभाव दाम्पत्य सुख की हानि कर सकता है।

द्वितीय भाव एवं द्वितीयेश-----

विवाह का अर्थ है एक नवीन परिवार की शुरूआत। द्वितीय भाव को धन एवं कुटुम्ब भाव कहते हैं। द्वितीय भाव से पारिवारिक सुख का पता चलता है। अतः द्वितीय भाव एवं द्वितीय भाव के स्वामी पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव दंपत्ति को पारिवारिक सुख से वंचित करता है।

पंचम भाव एवं पंचमेश------

शास्त्रानुसार जब मनुष्य जन्म लेता है तब जन्म लेने के साथ ही वह ऋणी हो जाता है। इन्हीं जन्मजात ऋणों में से एक है पितृ ऋण। जिससे संतानोपत्ति के द्वारा मुक्त हुआ जाता है। पंचम भाव से संतान सुख का ज्ञान होता है।
 पंचम भाव एवं इसके अधिपति पंचमेश पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव दंपत्ति को संतान सुख से वंचित करता है।

अष्टम भाव एवं अष्टमेश------

विवाहोपरान्त विधुर या वैधव्य भोग किसी आपदा के सदृश है। अतः भावी दम्पत्ति की आयु का भलीभांति परीक्षण आवश्यक है। अष्टम भाव एवं अष्टमेश से आयु का विचार किया जाता है। अष्टम भाव एवं अष्टमेश पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव दंपत्ति की आयु क्षीण करता है।
इन कारकों के अतिरिक्त दाम्पत्य सुख से नैसर्गिक कारकों जो वर की कुण्डली में शुक्र एवं कन्या की कुण्डली में गुरु होता है, पर पाप प्रभाव नहीं होना चाहिए। यदि वर अथवा कन्या की कुण्डली में दाम्पत्य सुख के नैसर्गिक कारक शुक्र व गुरु पाप प्रभाव से पीड़ित हैं या अशुभ भावों स्थित है तो दाम्पत्य सुख की हानि कर सकते हैं।

विंशोत्तरी दशा भी है महत्वपूर्ण----


उपरोक्त महत्वपूर्ण कारकों अतिरिक्त वर अथवा कन्या की महादशा एवं अंतर्दशाओं की भी कुण्डली मिलान में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है जिसकी अक्सर ज्योतिषी उपेक्षा कर देते हैं। हमारे अनुसार वर अथवा कन्या दोनों ही पर पाप व अनिष्ट ग्रहों की महादशा/अंतर्दशा का एक ही समय में आना भी दाम्पत्य सुख के लिए हानिकारक है। अतः उपरोक्त कारकों के मिलान एवं परीक्षण के उपरान्त महादशा व अंतर्दशाओं का परीक्षण परिणाम में सटीकता लाता है।

जब हो जाऐ गले में खरास तो क्या करें आयुर्वेदिक सफल इलाज

गले की खराश, इन्फेक्सन,गला बैठना तथा पानी पीने में तकलीफ होना का आयुर्वेदिक इलाज---

गले की खराश, या गले मे किसी भी प्रकार का इन्फेक्शन हो, गला बैठ गया है, पानी पीने मे भी तकलीफ हो रही है, लार निगलने मे भी तकलीफ हो रही है, आवाज भारी हो गयी है,इन सबके लिए 
एक ग्लास देशी गाय का दूध,एक चम्मच देशी गाय का घी और चौथाई चम्मच हल्दी को मिलाकर कुछ देर उबाल लेकर फिर उसको घूँट घूँट करके चाय की तरह शाम को एकबार पीना है ।

                    कई बार निम्न विषम परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं 


  1. हम जब खाँसते-खाँसते परेशान हो जाते हैं। और कोई दवा जब काम नहीं करती हो। 
  2. महिलाओं के लिए गर्भावस्था में एलोपैथिक दवाओं को लेना निरापद नहीं माना गया ह
  3. वहीं शल्य-चिकित्सा कराने वाले रोगियों के लिए ज्यादा देर तक खाँसना बिल्कुल भी ठीक नहीं होता है।और गले में खँरास खिच-खिच होती हो।
ऐसे में एक आसान औषधि जो सरल भी है सुगम भी है और अनुभूत है



प्रस्तुत है खांसी की अचूक आयुर्वेदिक औषधि :-

दालचीनी- थोड़ी मात्रा( लगभग एक ग्राम ) व शहद- आधा चम्मच




प्रयोग विधि;--
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दालचीनी (पूरी तरह पीसकर पाउडर बनी हुयीं) बायीं हाथ की हथेली पर लेकर उसमें आधा चम्मच शहद लेकर उसके ऊपर दालचीनी (दो चुटकी भर) डालें और दायें हाथ की अंगुली से अच्छी तरह मिलाएं और उसे चाट जाएं।

परिणाम;--
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* दो से तीन मिनट में खांसी जाती रहेगी। दोबारा खांसी हो तो इस प्रयोग को दोबारा आजमा सकते हैं।

* अगर दही खाते है तो उसे बंद करदे और रात को सोते समय दूध न पिए

* तुलसी, काली मिर्च और अदरक की चाय खांसी में सबसे बढि़या रहती हैं।

* हींग, त्रिफला, मुलहठी और मिश्री को नीबू के रस में मिलाकर लेने से खांसी कम करने में मदद मिलती है।

* पीपली, काली मिर्च, सौंठ और मुलहठी का चूर्ण बनाकर चौथाई चम्मच शहद के साथ लेना अच्छा रहता है।

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