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Wednesday, May 31, 2017

ऐलर्जी नाशक नुस्खा - जो दूर कर सकता है आपके शरीर की गर्मी, एलर्जी व शीत पित्त

ऐलर्जी नाशक नुस्खा - जो दूर कर सकता है आपके शरीर की गर्मी, एलर्जी व शीत पित्त 




आजकल जन सामान्य किसी न किसी प्रकार की एलर्जी से निम्नलिखित प्रयोग हर तरह की एलर्जी को समूल नष्ट करने की शक्ति रखता है।एलर्जी व शीतपित्त इत्यादि रोगों के लिए शास्त्रोक्त हरिद्रा खण्ड अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है।लेकिन निम्नलिखित नवीन प्रयोग उससे भी बहेतर है।


योग- पवित्र गंगाजल-1 लीटर


पिसी हुई मिश्री – 400 ग्राम


हल्दी का महीन चूर्ण – 300 ग्राम


शुद्ध स्वर्ण गैरिक – 200 ग्राम


मुलहठी का महीन चूर्ण – 100 ग्राम


निर्माण विघि- हल्दी, स्वर्ण गैरिक (सोना गैरु) तथा मुलहठी का चूर्ण आपस में खूब मिला लें । बडें खरल में डालकर वस्त्र से छना गंगाजल से घुटाई करें।कुछ दिनों बाद जब मिश्रण विल्कुल सूख जाए तब उसमें पिसी हुयी मिश्री डालकर सुरक्षित रखें।इस दवा का 1 -1 छोटे चम्मच मात्रा प्रतिदिन दिन में तीन बार स्वच्छ जल से 3 बार लेने से किसी भी प्रकार की एलर्जी ,शीतपित्त, रक्तविकार, शरीर की बढ़ी हुयी गर्मी दूर हो जाती है।

Tuesday, May 30, 2017

पुरुषों काम तृप्ति वाहक पुरुष जनन अंगों की जानकारी

पिछले अंको में मैने आपको नारी जनन अंगो की जानकारी प्रदान की थी शायद आप उससे सन्तुष्ट हुऐ होंगे। और उस जानकारी को देने की शुरुआत में हमने आपसे वायदा किया था कि हम आपको पुरुष जनन अंगो की भी जानकारी देगें।सो जानकारियाँ लेकर हम अपने वायदानुसार प्रकट हो गये हैं।
नारियों के समान ही प्रभु ने पुरुष के शरीर में भी अपनी कारीगरी का भरपूर प्रयोग किया है।और उन्हौने हमे अंग प्रदान करते समय ही उनकी देखभाल की भी हिदायत दी है किन्तु मानव ने जैसे अन्य प्राणियों का प्रयोग अपने मतलब से किया है । उसी प्रकार खुद अपने शरीर को भी न वख्स कर उसका भी दुर्पुयोग करने में नही हिचक रहा है। और जब स्वयं रोगी हो जाता है तो फिर अपने किये पर पछताता है।और फिर भगवान को दोष देता है।लैकिन भगवान ने तो सभी को यह नैमत वख्सी है किसी को छोड़ थोड़े ही दिया है।अब आगे की बात करते हैं।किसी भी रोग के इलाज से पहले आपको अपने या रोगी के अंगो की जानकारी व क्रिया विधि की जानकारी होना बहुत ही आवश्यक है।
पुरुष जननांग निम्न अंग व अंग तंत्रो को सम्मिलित करते हैं।

खांसी,जुकाम,एलर्जी, और सर्दी का आयुर्वेदिक घरेलू उपचार

खांसी,जुकाम,एलर्जी, और सर्दी का आयुर्वेदिक घरेलू उपचार

सर्दी, खांसी और जुखाम मानवता को सबसे अधिक प्रताड़ित करने वाले रोग हैं, जो वर्ष में कई कई बार जब भी मौसम की संध्याऐं अर्थात मिलान होता है तभी अपना आक्रमण कर देते हैं।इनके साथ खासियत यह भी है कि ये सभी एक ही  परिवार के रोग है अतः एक से परिवार के होने के कारण इनकी औषधियाँ भी लगभग एक सी होती हैं।

आज मैं आपको एसे आसान से नुस्खे यहाँ प्रस्तुत कर  रहा हूँ जिन्हैं आप घर पर ही बनाकर प्रयोग कर सकते हैं और ये सभी योग आयुर्वेदिक होने के कारण आपको कोई  एलोपेथी दवाओं जैसे  साइड इफेक्ट भी नहीं होंगे।

आयुर्वेदिक योग :- खांसी,जुकाम,एलर्जी सर्दी आदि के लिए घरेलूआयुर्वेदिक योग ============


मैं आपको ऐसा आयुर्वेदिक योग बता रहा हूँ जिसे आप घर पर बना सकते हैं, इसके लिए आपको चाहिए

1- तुलसी का काढ़ा  

     निर्माण सामिग्री---- 

तुलसी का काढ़ा  www.ayurvedlight.com

तुलसी का काढ़ा

तुलसी के पत्ते, तना और बीज तीनो का कुल वजन 50 ग्राम इसके लिए आप तुलसी को किल्ली सहित ऊपर से तोड़ लें इसमें बीज, तना और तुलसी के पत्ते तीनो आ जाएंगे इनको एक बर्तन में ले कर इसमें 500 मिली लीटर या आधा लीटर पानी डाल ले और इसमें 100 ग्राम अदरक और 20 ग्राम काली मिर्च दोनों को पीस कर डाले और अच्छे से उबाल कर काढा बनाने रख दें और जब पानी 100 ग्राम रह जाए तो इसे छान कर किसी काँच की बोतल में डाल कर रखे इसमे थोड़ा सा शहद मिला कर आप इसको दो चम्मच  मात्रा में दिन में 3 बार ले सकते है। 


जुकाम के लिए------

 2 चम्मच अजवायन को तवे पर हल्का भूने और फ़िर उसे एक रूमाल या कपडे में बांध ले और पोटली बना ले उस पोटली को नाक से सूंघे और सो जाए.

खांसी के लिए ------ कालीमिर्च व शहद की चटनी का प्रयोग--- 

खांसी के लिए ------ कालीमिर्च व शहद की चटनी का प्रयोग



खांसी के लिए ------ कालीमिर्च व शहद की चटनी का प्रयोग
  • प्रतिदिन में 3 बार हल्के गर्म पानी लेकर उसमें आधा चम्मच सैंधा नमक डाल कर गरारे करें।
  • सुबह उठने के बाद, दोपहर को और रात को सोने से पहले एक चम्मच शहद लेकर उसमें थोड़ी सी पिसी हुई काली मिर्च का पाऊडर डाल कर मिलाकर  चाटें
  • अगर खासी ज्यादा आ रही हो तो 2 साबुत काली मिर्च के दाने और थोडी सी मिश्री मुंह में रख कर चूसे आपको आराम मिलेगा.



चमत्कारी सूर्य तेल, घर पर बनाएं--- हृदय रोग से मुक्ति पायें।

हमारी सृष्टि के आदि देव हैं सूर्य जो सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करते हैं और करते हुये हमें दिखाई भी देते हैं।इन्हीं के कारण हम इस पृथ्वी पर जीवन की कल्पना कर पाते हैं। सभी प्राचीन सभ्यताओं में सूर्य देव को भगवान का दर्जा दिया गया था फिर चाहें वो प्राचीन यूनान की सभ्यता हो, वेवीलोन की , मेसोपोटामिया की या फिर चीन की लैकिन हम कहीं के बारे में बात न करें तो हमारे भारत वर्ष में तो भगवान सूर्य की महिमा को सर्वाधिक महत्व दिया ही गया है। 
भारतीय ज्योतिष शास्त्र में तो सूर्य का स्थान सर्वोपरि है क्योंकि सारे ग्रह सूर्य के इर्द गिर्द ही चक्कर लगाते हैं और सर्वाधिक प्रभाव भी उन्हीं का सम्पूर्ण कुण्डली पर पड़ता है उन्हीं के कारण कोई भी ग्रह अस्त हो जाता है। और उनकी रश्मियाँ कम तीव्र होने पर ही उदित हो पाता है।और जब हम कुण्डली की बात कर ही रहे हैं तो कई लोगों की कुण्डली में सूर्य ग्रह से पीड़ा भी हो सकती है। अतः भगवान भास्कर सूर्य नारायण स्वयं अपनी पीड़ा से शान्ति का उपाय भी जातक को प्रदान करते हैं। यह उपाय अचूक है जो न केवल कुण्डली के सूर्य दोष का शमन करता है अपितु सामान्य जातक भी अगर इस तेल के उपयोग से लाभान्वित हो सकता है। अतः यह कहा जा सकता है कि यह तेल वास्तव में सम्पूर्ण मानव जाति के लिए भगवान भास्कर का वरदान ही है। 
और तो और यह तेल हृदय रोग की भी रामवाण औषधि है। आयुर्वेदिक ग्रंथो में भी सूर्य चिकित्सा के अन्दर इस योग का उल्लेख मिलता है।

सूर्य तेल बनाने की विधि

सूर्य तेल बनाने के लिए 200 ग्राम सूरजमुखी व 200 ग्राम तिल का तेल लें। अब इसमें 4 ग्राम लौंग व 8 ग्राम केशर मिलाएं। औरइन सभी चीजों को लाल रंग की कांच की बोतल में रखें।
यदि काँच की लाल बोतल उपलब्ध न हो तो सफेद काँच की बोतल में रखकर लाल रंग की पन्नी या सेलोफेन कागज लपेट दें इस प्रकार लपेट कर इस बोतल को सम्पूर्ण सामिग्री सहित 15 दिनों के लिए खुली धूप में रखते रहैं। और शाम को वहाँ से हटा दें। इस प्रकार 15 दिनों की धूप प्राप्त कर यह तेल अपने अन्दर चमत्कारिक गुण प्राप्त कर लेगा जो आपके कुण्डली कृत दोषों को तो दूर करेगा ही जिन जातकों को हृदय रोग की समस्याऐं भी हैं उनका भी शमन करके उन्हैं स्वास्थ्य लाभ कराऐगा। उच्चरक्त चाप से पीड़ित अर्थात हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए पूरे शरीर पर तेल की मालिश करनी चाहिये। छोटे बच्चों के लिए मालिश करने के लिए यह सूर्य तेल किसी चमत्कार से कम नही होगा क्योंकि इसमें अन्य किसी भी तेल की अपेक्षा अधिक विटामिन डी पाया जाता है। 

सामान्य लोगों द्वारा जब तेल की मालिश सम्पूर्ण शरीर पर की जाती है तो उनकी कान्ति को बढ़ाता है जिससे आपके सौन्दर्य में चार चाँद लग जाते है।

सूर्य तेल को उपयोग करने की विधि---

सूर्य तेल चूँकि सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है और हमारे हिन्दू या अग्रेजी किसी भी कलेन्डर के मुताविक रविवार ही सूर्य का प्रतिनिधि दिन है अतः सूर्य तेल के प्रयोग की शुरुआत के लिए भी यही दिन सर्वाधिक उपयुक्त है। 

प्रत्येक दिन सूर्य तेल के उपयोग से आप सूर्य कृत दोषों से मुक्ति तो पाते ही हैं इसके अलाबा आपका शरीर कान्तिवान होता है आपके शरीर से हाई ब्लड प्रेशर व हृदय रोग के दोष भी मुक्त हो जाते है।वैसे तो यह तेल प्रतिदिन ही लगाना चाहिये किन्तु जिन लोगों को सुबिधा न हो वे प्रति सप्ताह में रविबार को तो इसे अवस्य ही इस्तेमाल कर सकते हैं। 
नोट- कृपया इस तेल को प्रयोग करने से पहले किसी ज्योतिषी को अपनी कुण्डली दिखा लें तो ज्यादा उपयुक्त रहेगा। 

प्राकृतिक सौन्दर्य प्रसाधन है मुल्तानी मिट्टी

आज से बीस पच्चीस बर्ष पहले तक गाँवो में महिलाऐं ही नही अपितु सम्पूर्ण जन समाज के बीच मुल्तानी मिट्टी नहाने में बहुत काम आती थी। किन्तु आजकल की बाजारु चमक ने पुराने प्राकृतिक औषधीय वस्तुओं के प्रयोग से समाज का ध्यान वँटा दिया है जिसके कारण आज समाज में अनेको रोग पैदा हो रहैं है एसे में जरुरत है कि इन बाजारु चीजों से दूर होकर पुनः प्रकृति की गोद में बैठा जाऐ जहाँ हम महफूज रह सके और महफूज रह सके हमारा अपना अमूल्य स्वास्थ्य और हम बने रहें जीवन के अंत तक निरोगी। मुल्तानी मिट्टी त्वचा की सुंदरता बढ़ाने के लिए  एक ऐसा नुस्खा है, जिसका उपयोग

प्राकृतिक सौन्दर्य प्रसाधन है मुल्तानी मिट्टी

सभी लड़कियां कर सकती हैं। त्वचा किसी भी तरह की हो या फिर त्वचा की कोई भी समस्या हो, मुल्तानी मिट्टी बहुत फायदेमंद है। इस गुणकारी मिट्टी का उपयोग सबसे ज्यादा सौंदर्य प्रसाधन के रूप में किया जाता है. मुल्तानी मिट्टी चेहरे पर लगाने से त्वचा गहराई से साफ हो जाती है और रंगत भी निखर जाती है. वहीं बालों को डीटॉक्स करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है.

मुल्तानी मिट्टी त्वचा को बहुत सारे फायदे पहुंचाती है. इसके इस्तेमाल से त्वचा से जुड़ी लगभग हर समस्या दूर हो जाती है. इसे गुलाब जल या फिर टमाटर के रस में मिलाकर लगाने से आपकी त्वचा सुंदर और स्वस्थ बनी रहती है. आइए जानते हैं इससे होने वाले फायदे.

चेहरे को चमकदार बनाती है
अगर आपकी त्वचा अपनी प्राकृतिक चमक खो चुकी है और आप इसे वापस लाने के तमाम उपाय करके थक चुकी हैं तो मुल्तानी मिट्टी का उपयोग करें. त्वचा को चमकदार बनाने के लिए मुल्तानी मिट्टी में चंदन पाउडर और टमाटर का रस मिलाकर लगाएं और सूखने पर गर्म पानी से धो लें. इससे आपकी त्वचा की प्राकृतिक चमक लौट आएगी.

त्वचा की कोमलता लौटाए
अगर आप अपनी रूखी त्वचा से परेशान हैं तो रात में कुछ बादाम दूध में भिगोकर रखें. सुबह इन्हें पीसकर मुल्तानी मिट्टी और दूध के साथ मिलाकर फेसपैक तैयार करें और चेहरे पर लगाएं. सूखने पर ठंडे पाने से धो लें. इससे आपकी त्वचा नर्म और मुलायम बन जाएगी.

ऑयली त्वचा के लिए
अगर आप ऑयली त्वचा की चिपचिपाहट से परेशान हैं और बार-बार चेहरा धोने पर भी ये समस्या खत्म नहीं होती तो मुल्तानी मिट्टी का उपयोग करें. इसके लिए गुलाब जल के साथ मुल्तानी मिट्टी मिलाकर फेसपैक तैयार करें और रोज चेहरे पर लगाएं.

टैनिंग हटाने के लिए
गर्मियों के मौसम में त्वचा की टैनिंग एक आम समस्या है और आपकी इस समस्या का हल भी मुल्तानी मिट्टी ही है. इसके लिए मुल्तानी मिट्टी, नारियल तेल और शक्कर मिलाकर चेहरे पर लगाएं और थोड़ी देर बाद हल्के हाथों से रगड़कर इसे निकालें. धीरे-धीरे त्वचा की टैनिंग चली जाएगी.

एलर्जी कारण व आयुर्वेदिक निवारण

है क्या एलर्जी?

शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमत जब कुछ बाहरी तत्वों, जैसे पराग कण, धूल, भोजन इत्यादि के प्रति  कुछ कम हो जाती है तो उसे हम वैज्ञानिक भाषा में एलर्जी कहते हैं।आज पूरे विश्व में यह रोग तेजी से फैल रहा है।और हालात यहाँ तक हो चुके हैं कि  युवा अवस्था एवं बाल्यावस्था में भी एलर्जी रोग देखने में आ रहा है। एलर्जी करने वाले तत्वों को एलरजेन कहा जाता है। ये एलरजेन या एलर्जी पैदा करने वाले तत्व वास्तव में कोई हानिकारक कीटाणु या विषाणु नहीं बल्कि अहानिकर तत्व ही होते हैं, जैसे पानी, गेहूं, बादाम, दूध, पराग कण या वातावरण में मौजूद कुछ प्राकृतिक तत्व। यही कारण है कि सभी लोगों को ये हानि नहीं पहुंचाते। एक ही घर में, एक ही प्रकार के वातावरण से एक व्यक्ति को एलर्जी होती है तो दूसरे को नहीं। 

आखिर क्या कारण होता है एलर्जी का? क्यों किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति हानिकारक प्रतिक्रिया करती है?

आयुर्वेदानुसार एक स्वस्थ व्यक्ति में वात पित्त व कफ साम्य अवस्था  में होते हैं। इसी कारण उनकी रोग प्रतिरोध शक्ति किसी एलरजेन के सम्पर्क में आकर भी किसी प्रकार की  प्रतिक्रिया  अर्थात एलर्जी पैदा नहीं करती है। जब ये त्रिदोष साम्यावस्था में  रहते हैं तो हमारे शरीर की ओज शाक्ति उत्तम होती है। और जब उत्तम ओज होता है तो किसी प्रकार की ऐलर्जी या रोग हो ही नही सकता या कहैं कि प्रतिरोधक क्षमता होने पर कोई रोग शरीर पर टिक ही नही सकता है, यानि उत्तम रोग प्रतिरोधक शक्ति हमारे शरीर से नियमित रूप से हानिकारक तत्वों को निष्कासित करती है और इसी कारण कोई भी बाहरी तत्व उसमें किसी प्रकार की प्रतिक्रिया कर ही नही सकता।

आयुर्वेदानुसार एलर्जी का मूल कारण है आपकी असामान्य पाचक अग्नि, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता,और दोषों की विषमता। इसमें भी अधिक महत्व पाचक अग्नि का माना गया है। जब पाचक अग्नि से भोजन का सही रूप पाक नहीं हो पाता है तो भोजन अधपचा रहता है। इस अधपके भोजन से एक चिकना विषैला पदार्थ पैदा होता है जिसे ‘आम’ कहते हैं। यह आम ही एलर्जी का मूल कारण होता है। यदि समय रहते इस आम का उपचार नहीं किया जाए तो यह आतों में जमा होने लगता है और पूरे शरीर में भ्रमण करता है। जहां कहीं इसको कमजोर स्थान मिलता है वहां जाकर जमा हो जाता है और पुराना होने पर आमविष कहलाता है। आमविष हमारी ओज शक्ति को दूषित कर देता है। इसके कारण, जब कभी उस स्थान या अवयव का सम्पर्क एलरजेन से होता है तो वहां एलर्जी प्रतिक्रिया होती है।

यदि आमविष त्वचा में है तो एलरजन के सम्पर्क में आने से वहां पर खुजली, जलन, आदि लक्षण होते है, यदि आमविष श्वसन संस्थान में है तो श्वास कष्ट, छीकें आना, नाक से पानी गिरना, खांसी इत्यादि और यदि पाचन संस्थान में है तो अतिसार, पेट दर्द, अर्जीण आदि लक्षण होते हैं।

पाचक अग्नि के अतिरिक्त वात, पित्त, कफ के वैषम्य से भी प्रतिरोधक क्षमता क्षीण एवं दूषित हो जाती है जिसकी वजह से एलर्जी हो सकती है। इसके अलावा तनाव, नकारात्मक सोच, शोक, चिन्ता आदि भी हमारे पाचन पर असर डालते हैं, जिससे आँव पैदा होता है। इसलिए कुछ लोगों में एलर्जी का मूल कारण मानसिक विकार भी माना गया है। इसके अतिरिक्त कई बार एलर्जी रोग को अनुवांशिक यानि हैरीडिटीकल भी माना गया है। क्योंकि कुछ लोगों में जन्म से ही पाचक अग्नि एवं प्रतिरोधक क्षमता क्षीण या कमजोर होती है।

आयुर्वेदिक उपचार

आयुर्वेद में एलर्जी का सफल इलाज है। आयुर्वेदिक उपचार रोग के मूल कारण को नष्ट करने में सक्षम होने के कारण रोग को जड़ से ठीक करता है। एलर्जी के उपचार में आमविष के निस्कासन के लिए औषधि दी जाती है। इसलिए सर्वप्रथम शोधन चिकित्सा करते हैं, जिससे शरीर में जमे आम विष को नष्ट किया जाता है। इसके अतिरिक्त दोषों एवं धातुओं को साम्यावस्था में लाकर ओज शक्ति को स्वस्थ बनाया जाता है। यदि रोगी मानसिक स्तर पर अस्वस्थ है तो उसका उपचार किया जाता है और एलर्जी के लक्षणों को शान्त करने के लिए भी औषधि दी जाती है।

उचित उपचार के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श लें और उनके द्वारा दी गई। औषधियों का नियमित रूप से सेवन करें। रोग पुराना एवं कष्ट साध्य होने के कारण ठीक होने में कुछ समय लेगा, इसलिए संयम के साथ चिकित्सक के परामर्शनुसार औषधियों एवं आहार-विहार का सेवन करें। यदि आप एलर्जी से पीड़ित हैं तो औषधियों के साथ-साथ निम्न उपचारों के प्रयोग से भी आपको लाभ मिलेगा।

घरेलू उपचार

पानी में ताजा अदरक, सोंफ एवं पौदीना उबालकर उसे गुनगुना होने पर पीयें।, इसे आप दिन में 2-3 बार पी सकते हैं। इससे शरीर के स्रोतसों की शुद्धि होती है एवं आम का पाचन होता है।

लघु एवं सुपाच्य भोजन करें जैसे लौकी, तुरई, मूंग दाल, खिचड़ी, पोहा, उपमा, सब्जियों के सूप, उबली हुई सब्जियां, ताजे फल, ताजे फलों का रस एवं सलाद इत्यादि। सप्ताह में एक दिन उपवास रखें, केवल फलाहार करें। नियमित रूप से योग और प्राणायाम करें। रात को सोते समय एक चम्मच त्रिफला चूर्ण लें और हर रोज एक बड़ा चम्मच च्यवनप्राश लें।

Monday, May 29, 2017

बच्चों की शादी करने से पहले कुण्डली मिलान एक अति आवश्यक व अति महत्वपूर्ण कार्य

कुण्डली मिलान विवाह से पहले क्यों जरुरी है?



हिन्दु संस्कृृति विश्व की महानतम सभ्यता व संस्कृति है जिसमें व्यक्ति के जीवन का वैज्ञानिक तरीके से अवलोकन कर जीवन जीना व जीवन के बाद में मोक्ष प्राप्त होना तक निहित किया गया है हमारे जीवन में हमारे जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त कुल सोलह संस्कार हैं जिनसे होकर जो व्यक्ति ठीक ठीक प्रकार जीवन जीता है वह वास्तव में सुखानुभूति करता है। इन्ही सोलह संस्कारों में एक संस्कार है विवाह जिसका अनुकरण करके ही वास्तव में जीवन की शुरुआत होती है जब जीवन साथी जीवन में आ जाता है व्यक्ति अब युगल कहलाते हैं । यहीं से जीवन की वास्तविक शुरुआत होती है अतः यह ध्यान देने की बात है कि शुरुआत में बड़ा ही सोच समझकर कदम रखा जाऐ नही पूरा जीवन समस्याग्रस्त हो सकता है।
 इस सब में माता पिता का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है क्योंकि बिना शादी किये लड़का या लड़की ज्यादातर परिपक्व नही होते हैं और बिना परिपक्वता के जीवन का महत्वपूर्ण निर्णय लेना उनके शायद ही बस में होता है अतः इन निर्णयों में निश्चित ही माता पिता व घर के बड़ों का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहता है।

              हमारे धार्मिक जीवन में विवाह एक सामान्य संस्था नही है अपितु बहुत ही महत्वपूर्ण संस्था है जिसका अस्तित्व केवल एक या दो साल के लिए नही अपितु संपूर्ण जीवन के लिए होता है । अतः जरुरी है कि हर प्रकार से हर रास्ते से इस रिस्ते पर ध्यान देने के बाद ही इस संबंध को जारी किया जाऐ ।ज्योतिष व्यक्ति के जीवन का आइना दिखाता है क्योंकि व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके जन्म समय पर बैठे ग्रहों की चाल पर आधारित होता है अतः जरुरी है कि इस महत्वपूर्ण विषय का निर्णय करते समय ज्योतिष का सहयोग लिया जाऐ और अपने जीवन के सपनों को साकार किया जाऐ। ज्योतिष आपके लिए उचित ही नही सर्वाधिक उपयुक्त जीवन साथी की तलाश कर सकता है। लैकिन जरुरी है कि आप कुण्डलियों का मिलान ज्योतिष के नियमों के आधार पर सही ज्योतिषी से कराये।जो विना किसी लोभ लालच के आपका सहयोग करे।ये न हो कि पैसे के लालच में आपके गलत निर्णय पर ही हामी भर दे। ज्यादातर एसा होता है कि पंडित जी के पास जाकर व्यक्ति उन्हैं कहता है पंडित जी हमने लड़की या लड़का देख लिया है बहुत अच्छा घर है परिवार है घर का उसका मकान है उसकी जॉव भी बहुत अच्छी है बस आप शादी बना दें पंडित जी भी देखते हैं कि मेरा क्या जाता है अगर मना करुंगा तो यह व्यक्ति कहीं और चला जाऐगा और मेरे जो शादी आदि में रुपये बनने हैं वे भी नही मिल पाऐंगे अतः कुण्डली न मिलने पर भी पंडित जी हाँ कर देते हैं लैकिन ऐसे में किसी अन्य का नही अपितु अपने बच्चों का जीवन ही अंधकार से भर जाता है।बच्चों के युवा होते ही माता-पिता को उनके विवाह की चिंता सताने लगती है। विवाह का विचार मन में आते ही जो सबसे बड़ी चिंता माता-पिता के समक्ष होती है वह है अपने पुत्र या पुत्री के लिए योग्य जीवनसाथी की तलाश। इस तलाश के पूरी होते ही एक दूसरी चिंता सामने आ खड़ी होती है, वह है भावी दंपत्ति की कुंडलियों का मिलान जिसे ज्योतिष की भाषा में कुण्डली मिलाना कहा जाता है। प्राचीन समय में कुंडली-मिलान अत्यावश्यक माना जाता था।

वर्तमान सूचना और प्रौद्यागिकी के दौर में कुण्डली मिलान केवल एक रस्म अदायगी बनकर रह गया है। ज्योतिष शास्त्र ने कुण्डली मिलान  में अलग-अलग आधार पर गुणों की कुल संख्या 36 निर्धारित की है जिसमें 18 या उससे अधिक गुणों का मिलान विवाह के लिए अति आवश्यक होता है।
लेकिन केवल गुणों की संख्या के आधार पर दाम्पत्य सुख निश्चय कर लेना उचित नहीं है। अधिकतर देखने में आया है कि 18 से ज्यादा गुणों के मिल जाने के उपरान्त भी दंपत्तियों के मध्य दाम्पत्य सुख का अभाव पाया गया है। इसका मुख्य कारण है कुण्डली मिलान  को मात्र गुण आधारित प्रक्रिया समझना जैसे .यह कोई परीक्षा हो। जिसमें न्यूनतम अंक पाने पर विद्यार्थी उत्तीर्ण नही तो 1-2 अंक कम आने से अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता है। ज्योतिष इतना सरल व संक्षिप्त विषय नहीं है।
गुण आधारित कुण्डली मिलान की यह विधि पूर्णतया ठीक नहीं माना जा सकता  है। या यह कह सकते हैं कि कुण्डली मिलान से विवाह पूर्णतः समस्या मुक्त हो गया है यह नही कहा जा सकता है हाँ यह अवस्य़ है कि यह कुण्डली मिलान की पहली सीढ़ी पार कर गया है ।
 विवाह में कुंडलियों का मिलान करते समय गुणों के अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण बातों का भी विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। भले ही गुण निर्धारित संख्या की अपेक्षा कम मिलें हो परन्तु दाम्पत्य सुख के अन्य कारकों से यदि दाम्पत्य सुख की सुनिश्चितता होती है तो विवाह करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। आइए जानते हैं कि कुण्डली मिलान  करते या करवाते समय गुणों के अतिरिक्त किन विशेष बातों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है।
विवाह का उद्देश्य गृहस्थ आश्रम में पदार्पण के साथ ही वंश वृद्धि और उत्तम दाम्पत्य सुख प्राप्त करना होता है। प्रेम व सामंजस्य से परिपूर्ण परिवार ही इस संसार में स्वर्ग के समान होता है। इन उद्देश्यों की पूर्ति की संभावनाओं के ज्ञान के लिए मनुष्य के जन्मांग चक्र में कुछ महत्वपूर्ण कारक होते हैं।
ये कारक हैं-सप्तम भाव एवं सप्तमेश, द्वादश भाव एवं द्वादशेश, द्वितीय भाव एवं द्वितीयेश, पंचम भाव एवं पंचमेश, अष्टम भाव एवं अष्टमेश के अतिरिक्त दाम्पत्य का नैसर्गिक कारक ग्रह शुक्र (पुरुषों के लिए) व गुरु (स्त्रियों के लिए)।

सप्तम भाव एवं सप्तमेश-----

दाम्पत्य सुख प्राप्ति के लिए सप्तम भाव का विशेष महत्व होता है। सप्तम भाव ही साझेदारी का भी होता है। विवाह में साझेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अतः सप्तम भाव पर कोई पाप ग्रह का प्रभाव नहीं होना चाहिए। सप्तम भाव के अधिपति का सप्तमेश कहा जाता है। सप्तम भाव की तरह ही सप्तमेश पर कोई पाप प्रभाव नहीं होना चाहिए और ना ही सप्तमेश किसी अशुभ भाव में स्थित होना चाहिए।

द्वादश भाव एवं द्वादशेश------

सप्तम भाव के ही सदृश द्वादश भाव भी दाम्पत्य सुख के लिए अहम माना गया है। द्वादश भाव को शैय्या सुख का अर्थात्‌ यौन सुख प्राप्ति का भाव माना गया है। अतः द्वादश भाव एवं इसके अधिपति द्वादशेश पर किसी भी प्रकार के पाप ग्रहों का प्रभाव दाम्पत्य सुख की हानि कर सकता है।

द्वितीय भाव एवं द्वितीयेश-----

विवाह का अर्थ है एक नवीन परिवार की शुरूआत। द्वितीय भाव को धन एवं कुटुम्ब भाव कहते हैं। द्वितीय भाव से पारिवारिक सुख का पता चलता है। अतः द्वितीय भाव एवं द्वितीय भाव के स्वामी पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव दंपत्ति को पारिवारिक सुख से वंचित करता है।

पंचम भाव एवं पंचमेश------

शास्त्रानुसार जब मनुष्य जन्म लेता है तब जन्म लेने के साथ ही वह ऋणी हो जाता है। इन्हीं जन्मजात ऋणों में से एक है पितृ ऋण। जिससे संतानोपत्ति के द्वारा मुक्त हुआ जाता है। पंचम भाव से संतान सुख का ज्ञान होता है।
 पंचम भाव एवं इसके अधिपति पंचमेश पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव दंपत्ति को संतान सुख से वंचित करता है।

अष्टम भाव एवं अष्टमेश------

विवाहोपरान्त विधुर या वैधव्य भोग किसी आपदा के सदृश है। अतः भावी दम्पत्ति की आयु का भलीभांति परीक्षण आवश्यक है। अष्टम भाव एवं अष्टमेश से आयु का विचार किया जाता है। अष्टम भाव एवं अष्टमेश पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव दंपत्ति की आयु क्षीण करता है।
इन कारकों के अतिरिक्त दाम्पत्य सुख से नैसर्गिक कारकों जो वर की कुण्डली में शुक्र एवं कन्या की कुण्डली में गुरु होता है, पर पाप प्रभाव नहीं होना चाहिए। यदि वर अथवा कन्या की कुण्डली में दाम्पत्य सुख के नैसर्गिक कारक शुक्र व गुरु पाप प्रभाव से पीड़ित हैं या अशुभ भावों स्थित है तो दाम्पत्य सुख की हानि कर सकते हैं।

विंशोत्तरी दशा भी है महत्वपूर्ण----


उपरोक्त महत्वपूर्ण कारकों अतिरिक्त वर अथवा कन्या की महादशा एवं अंतर्दशाओं की भी कुण्डली मिलान में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है जिसकी अक्सर ज्योतिषी उपेक्षा कर देते हैं। हमारे अनुसार वर अथवा कन्या दोनों ही पर पाप व अनिष्ट ग्रहों की महादशा/अंतर्दशा का एक ही समय में आना भी दाम्पत्य सुख के लिए हानिकारक है। अतः उपरोक्त कारकों के मिलान एवं परीक्षण के उपरान्त महादशा व अंतर्दशाओं का परीक्षण परिणाम में सटीकता लाता है।

जब हो जाऐ गले में खरास तो क्या करें आयुर्वेदिक सफल इलाज

गले की खराश, इन्फेक्सन,गला बैठना तथा पानी पीने में तकलीफ होना का आयुर्वेदिक इलाज---

गले की खराश, या गले मे किसी भी प्रकार का इन्फेक्शन हो, गला बैठ गया है, पानी पीने मे भी तकलीफ हो रही है, लार निगलने मे भी तकलीफ हो रही है, आवाज भारी हो गयी है,इन सबके लिए 
एक ग्लास देशी गाय का दूध,एक चम्मच देशी गाय का घी और चौथाई चम्मच हल्दी को मिलाकर कुछ देर उबाल लेकर फिर उसको घूँट घूँट करके चाय की तरह शाम को एकबार पीना है ।

                    कई बार निम्न विषम परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं 


  1. हम जब खाँसते-खाँसते परेशान हो जाते हैं। और कोई दवा जब काम नहीं करती हो। 
  2. महिलाओं के लिए गर्भावस्था में एलोपैथिक दवाओं को लेना निरापद नहीं माना गया ह
  3. वहीं शल्य-चिकित्सा कराने वाले रोगियों के लिए ज्यादा देर तक खाँसना बिल्कुल भी ठीक नहीं होता है।और गले में खँरास खिच-खिच होती हो।
ऐसे में एक आसान औषधि जो सरल भी है सुगम भी है और अनुभूत है



प्रस्तुत है खांसी की अचूक आयुर्वेदिक औषधि :-

दालचीनी- थोड़ी मात्रा( लगभग एक ग्राम ) व शहद- आधा चम्मच




प्रयोग विधि;--
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दालचीनी (पूरी तरह पीसकर पाउडर बनी हुयीं) बायीं हाथ की हथेली पर लेकर उसमें आधा चम्मच शहद लेकर उसके ऊपर दालचीनी (दो चुटकी भर) डालें और दायें हाथ की अंगुली से अच्छी तरह मिलाएं और उसे चाट जाएं।

परिणाम;--
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* दो से तीन मिनट में खांसी जाती रहेगी। दोबारा खांसी हो तो इस प्रयोग को दोबारा आजमा सकते हैं।

* अगर दही खाते है तो उसे बंद करदे और रात को सोते समय दूध न पिए

* तुलसी, काली मिर्च और अदरक की चाय खांसी में सबसे बढि़या रहती हैं।

* हींग, त्रिफला, मुलहठी और मिश्री को नीबू के रस में मिलाकर लेने से खांसी कम करने में मदद मिलती है।

* पीपली, काली मिर्च, सौंठ और मुलहठी का चूर्ण बनाकर चौथाई चम्मच शहद के साथ लेना अच्छा रहता है।

चना एक सर्वोत्तम टानिक है।Gram- A best tonic

चना आयुर्वेद में सदियों से ऊर्जा के स्रोत के रुप में अपनाया जाता रहा है। अभी थोड़े से साल पहले तक आम घरों में गैहूँ चना जौ व मटर का आटा रोटियाँ बनाने के लिए प्रयोग होता था।लैकिन समय के साथ यह प्रयोग कम होता गया ।यह एक अति सेहतमंद दाल है जो कई रंगों मे पायी जाती है। काला चना, कत्थई चना, सफेद चना, सफेद बारीक चना, सफेद काबुली चना आदि अनेक प्रकार के आकार व प्रकार में चना पाया जाता है।

 इसका सेवन हम चाट के रुप में तो बाजारों में करते ही हैं इसके अतिरिक्त सब्जी के रुप में भी किया जाता है । छोले भटूरे का स्वाद तो आपने लिया ही होगा इसमें अगर छोला न हो तो इस स्वाद की कल्पना भी नही की जा  सकती है। आपने बसों में रेलगाड़ियों में भी चने बेचने बालों को देखा होगा वे कई बार उबाल कर चना बेचते हैं तो कई केवल उन्हैं भिगोकर उसमें कुछ सलाद व मसाला छिड़ककर बैचते हैं तो कई इन्हैं अंकुरित करके उसमें मसाला मिलाकर प्रस्तुत करते हैं।बाजारों में भुना चना मिलता है।आइये चने के बारे में विचार करते हैं आज यह कितना फायदेमंद है सेहत के लिए जाने

चने के इंग्रीडेंट्स----

चने में भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम के साथ ही अन्य दूसरे मिनरल्स भी होते हैं। इसके अलावा अंकुरित काला चना अधिक फायदेमंद होता है। अंकुरित चने में विटामिन ए, बी, सी, डी, और के साथ ही फास्फोरस, पोटैशियम, मैग्नीशियम पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
                                           Read new topic----    स्वास्थ्य की पूँजी है- पूजा का दीपक

चना फाइबर का अच्छा स्रोत है---

स्वास्थ रहने के लिए फाइबर हमारे शरीर के लिए बहुत जरूरी होता है। यह हमारी पाचन क्रिया को सबल करता है। काला चना फाइबर से भरपूर होता है, इसलिए यह पाचन क्रिया को सुधारता है। रातभर भिगोकर रखे गए चने को खाने से कब्ज की समस्या का निदान करते हैं। ध्यान रखें चने का वह पानी जिसमें इसे भिगोकर रखा गया था वह भी कम फायदेंमंद नही है अपितु यह ज्यादा ही फायदेमंद होता है। 

चना एनर्जेटिक हैः

जैसा कि हम जानते है कि किसी भी कार्य के लिए हमें ऊर्जा की आवश्यकता होती है और चना इनर्जी का एक बहुत ही अच्छा स्रोत है। काला चना इसमें और भी ज्यादा अच्छा काम करता है।चना एक अप्रतिम ऊर्जा  स्रोत है अगर यह गुड़ के साथ भुना हुआ लिया जाऐ तो यह और भी अच्छा काम करता है। यह मधुमेह अर्थात डायबिटीज के रोगियों के लिए भी दिया जा सकता है जिसका उन्हैं बहुत फायदा होता है।

रक्ताल्पता अर्थात एनीमिया का शत्रु है चना-

चना रक्त की कमी को पूरा करने बाला एसा पोषक तत्व है जो आपकी सेहत को जल्दी ही सुधार कर आपको आश्चर्यचकित कर सकता है। आप बस प्रतिदिन सुबह ही खाली पेट कुछ चने खाने की आदत डाल लीजिए ये रात में भिगो दिये जाते हैं इन्हैं विना उवाले ही कच्चा खाया जा सकता है हाँ अपने स्वादा नुसार सलाद मिलाया जा सकता है।बस यही आदत आपके शरीर में खून की कमी को दूर कर देता है। गर्भवती महिलाओं में चना खून की कमियों को दूर कर उन्हैं स्वस्थ रखने की गारंटी हो सकता है।

आपके त्वचा का बहुत बढ़िया स्किन केयरर है चना--

अन्त में यह कहा जाऐ कि चना बाकी अन्य लाभों के अलाबा आपका हैल्दी स्किन केयर टानिक भी है तो अतिश्योक्ति नही होगी यह बास्तव में त्वचा का रंग निखार कर सुन्दर देह प्रदान करता है।चने को भिगोने के बाद बचे पानी से चेहरा धोने से चहेरे पर चमक आती है । 
चना एक हैल्दी ब्रेकफास्ट है जो आपकी सेहत का सबसे अच्छा ख्याल करता है। अतः प्रतिदिन सुबह चाय लेने से एक घण्टा पहले भिगोया हुआ चना आपको पूर्णतया फिट रखेगा जो आपको उस दिन के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करेगा।

व्यक्तित्व का आइना है आपका हस्ताक्षर


मानव भगवान की अद्भुद रचना है जिसका दिमाग बहुत तैज है लैकिन हमारे ऋषियों ने प्रकृति की अभूतपूर्व रचना के बारे में जो जाना कि किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके हस्ताक्षर में झलकता है उसके व्यक्तित्व को जानने के लिए आप उसके किये हस्ताक्षर को ध्यान से देखें तो पाऐंगे कि हर व्यक्ति अलग प्रकार से हस्ताक्षर करता है जो उसके व्यक्तित्व को परिभाषित कर सकता है तो जानिये ये सूत्र 
1. जो लोग हस्ताक्षर में सिर्फ अपना नाम लिखते हैं, सरनेम नहीं लिखते हैं, वे खुद के सिद्धांतों पर काम करने वाले होते हैं। आमतौर पर ऐसे लोग किसी और की सलाह नहीं मानते हैं, ये लोग सुनते सबकी हैं, लेकिन करते करते अपने मन की हैं।
2. जो लोग जल्दी-जल्दी और अस्पष्ट हस्ताक्षर करते हैं, वे जीवन में कई प्रकार की परेशानियों का सामना करते हैं। ऐसे लोग सुखी जीवन नहीं जी पाते हैं। हालांकि, ऐसे लोगों में कामयाब होने की चाहत बहुत अधिक होती है और इसके लिए वे श्रम भी करते हैं। ये लोग किसी को धोखा भी दे सकते हैं। स्वभाव से चतुर होते हैं, इसी वजह से इन्हें कोई धोखा नहीं दे
3. कुछ लोग हस्ताक्षर तोड़-मरोड़ कर या टुकड़े-टुकड़े या अलग-अलग हिस्सों में करते हैं, हस्ताक्षर के शब्द छोटे-छोटे और अस्पष्ट होते हैं जो आसानी से समझ नहीं आते हैं। सामान्यत: ऐसे लोग बहुत ही चालाक होते हैं। ये लोग अपने काम से जुड़े राज किसी के सामने जाहिर नहीं करते हैं। कभी-कभी ये लोग गलत रास्तों पर भी चल देते हैं और किसी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।
4. जो लोग कलात्मक और आकर्षक हस्ताक्षर करते हैं, वे रचनात्मक स्वभाव के होते हैं। इन्हें किसी भी कार्य को कलात्मक ढंग से करना पसंद होता है। ऐसे लोग किसी न किसी कार्य में हुनरमंद होते हैं। इन लोगों के काम करने का तरीका अन्य लोगों से एकदम अलग होता है। ऐसे हस्ताक्षर वाले लोग पेंटर या कलाकार भी हो सकते हैं।
5. कुछ लोग हस्ताक्षर के नीचे दो लाइन खींचते हैं। ऐसे सिग्नेचर करने वाले लोगों में असुरक्षा की भावना अधिक होती है। किसी काम में सफलता मिलेगी या नहीं, इस बात का संदेह सदैव रहता है। पैसा खर्च करने में इन्हें काफी बुरा महसूस होता है अर्थात ये लोग कंजूस भी हो सकते हैं।
6. जो लोग हस्ताक्षर करते समय नाम का पहला अक्षर थोड़ा बड़ा और पूरा उपनाम लिखते हैं, वे अद्भुत प्रतिभा के धनी होते हैं। ऐसे लोग जीवन में सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करते हैं। ईश्वर में आस्था रखने वाले और धार्मिक कार्य करना इनका स्वभाव होता है। ऐसे लोगों का वैवाहिक जीवन भी सुखी होता है।
7. जिन लोगों के सिग्नेचर मध्यम आकार के अक्षर वाले, जैसी उनकी लिखावट है, ठीक वैसे ही हस्ताक्षर हो तो व्यक्ति हर काम को बहुत ही अच्छे ढंग से करता है। ये लोग हर काम में संतुलन बनाए रखते हैं। दूसरों के सामने बनावटी स्वभाव नहीं रखते हैं। जैसे ये वास्तव में होते हैं, ठीक वैसा ही खुद को प्रदर्शित करते हैं।
8. जो लोग अपने हस्ताक्षर को नीचे से ऊपर की ओर ले जाते हैं, वे आशावादी होते हैं। निराशा का भाव उनके स्वभाव में नहीं होता है। ऐसे लोग भगवान में आस्था रखने वाले होते हैं। इनका उद्देश्य जीवन में ऊपर की ओर बढ़ना होता है। इस प्रकार हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति अन्य लोगों का प्रतिनिधित्व करने की इच्छा रखते हैं।
9. जिन लोगों के हस्ताक्षर ऊपर से नीचे की ओर जाते हैं, वे नकारात्मक विचारों वाले हो सकते हैं। ऐस लोग किसी भी काम में असफलता की बात पहले सोचते हैं।
10. जिन लोगों के हस्ताक्षर एक जैसे लयबद्ध नहीं दिखाई देते हैं, वे मानसिक रूप से अस्थिर होते होते हैं। इन्हें मानसिक कार्यों में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। साथ ही, इनके विचारों में परिवर्तन होते रहते हैं। ये लोग किसी एक बात पर अडिग नहीं रह सकते हैं।
11. जिन लोगों के हस्ताक्षर सामान्य रूप से कटे हुए दिखाई देते हैं, वे नकारात्मक विचारों वाले होते हैं। इन्हें किसी भी कार्य में असफलता पहले नजर आती है। इसी वजह से नए काम करने में इन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
12. यदि कोई व्यक्ति हस्ताक्षर के अंत में लंबी लाइन खींचता है तो वह ऊर्जावान होता है। ऐसे लोग दूसरों की मदद के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। किसी भी काम को पूरे मन से करते हैं और सफलता भी प्राप्त करते हैं।
13. जो लोग हस्ताक्षर करते समय अपना मिडिल नेम पहले लिखते हैं, वे अपनी पसंद-नापंसद को अधिक महत्व देते हैं। इसके बाद कार्यों को पूरा करने में लग जाते हैं।
14. जो लोग हस्ताक्षर का पहला अक्षर बड़ा लिखते हैं, वे अद्भुत प्रतिभा के धनी होते हैं। ऐसे लोग किसी भी कार्य को अपने अलग ही अंदाज से पूरा करते हैं। अपने कार्य में पारंगत होते हैं। पहला अक्षर बड़ा बनाने के बाद अन्य अक्षर छोटे-छोटे और सुंदर दिखाई देते हों तो व्यक्ति धीरे-धीरे किसी खास मुकाम पर पहुंच जाता है। ऐसे लोगों को जीवन में सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त हो जाती है। 

Sunday, May 28, 2017

RAKSHABANDHAN WALLPAPER


Rakshabandhan Full Size HD Wallpaper Free Download
Raksha bandhan is not just about rakhi, roli and mithai. It,s also about the unique bond between a brother and a sister. Celebrate the buetiful bond you share with your sibling/ cousin with our warm and wonderful Rakhshabandhan cards.

Raksha Bandhan is not just about rakhi, roli and mithai... It's also about the unique bond between a brother and a sister. Celebrate the beautiful bond you share with your sibling/ cousin with our warm and wonderful Happy Raksha Bandhan ecards.

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          This Rakshabandhan send this rakhi and a hug to your brother wishing that next year you two are together.

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सेक्स - सच्चाई और मिथक समझना अति आवश्यक है


सेक्स सच्चाई और मिथ्या बाते ----
सेक्स एक एसा विषय है जिस पर सारी दुनिया केन्द्रित है इसे लेकर लोगों के मन में बहुत पुराने समय से ही कई तरह की आशंकाएं, उत्सुकता और रोमांच रहा है। साथ ही अनेकों प्रकार की गलतफहमियां भी जुड़ी हुयीं हैं। बेहतर है कि आप इस क्रिया में जाने से पहले अपनी तमाम आशंकाओं को निर्मूल कर लें। तब देखिये , यह कितना इंज्वायफुल हो सकता है।


सेक्स से जुड़ी अनेकों फंतासी हैं जैसे किसी ने आपके साथ दो-चार चिकनी-चुपड़ी बातें क्या कर ली, हँँस क्या ली। आपने मान लिया, हंसी तो फंसी। जबकि ये सही नहीं है। ठीक यही स्थिति सेक्स को लेकर भी है। सेक्स को लेकर जितनी फंतासियां हैं, जितनी कहानियाँ हैं, उतने ही मिथक भी हैं, जो कई बार सच के करीब होकर भी सच नहीं होते।बस लगता जरुर है कि ये सच हैं । लोगों की एक सोच है कि विवाह का मुकाम सिर्फ सेक्स है। और सेक्स बोरियत मिटाने का तरीका है। लैकिन सच शायद कुछ और ही है । इसके अलावा अन्य मिथक भी हैं यथा
ऑर्गेज्म के बिना सेक्स सिर्फ लस्ट है।यह उन दिनों में नहीं करना चाहिए। ऐसे करना चाहिए , ऐसे नहीं... फलां...फलां आदि अनेक मुँह अनेक बातें । लैकिन  सच्चाई तो यह है कि आपने यदि सेक्स को लेकर सुनी-सुनाई व आधी-अधूरी जानकारियों पर भरोसा किया, तो यकीन मानिए आपकी 'बेड लाइफ' या वास्तव में कहैं तो आपकी वैवाहिक जिन्दगी बर्बाद होकर रहेगी। सेक्सोलोजिस्ट व डॉक्टरों के अनुसार  सेक्स आपके स्वास्थ्य को फिट रखता हैै। हाँ, कुछ खास परिस्थितियों में जैसे पीरिएड्स के समय, रोग की अवस्था में या फिर मूढ़ न हो तब  सेक्स वर्जित होना चाहिए, वरना सेक्स सेहत के लिए घातक भी हो सकता है। जैसे इंफेक्शन, यौन संक्रमित बीमारियां आदि ।

सेक्स शारीरिक भूख शान्ति का साधन नही  मानसिक सुख का कारक है-
माना कि सेक्स शरीर की जरूरत है।किन्तु शरीर भी मन से ही संचालित होता है यह सोचना कि  कभी भी, कहीं भी सेक्स से गुरेज नहीं करना चाहिए।गलत है। माना कि सेक्स शरीर की जरूरत है, लेकिन किसी दबाब में की गई कोई भी क्रिया खुशी नहीं देती। फिर यह तो सेक्स है सेक्स वास्तव में दो शरीरों का नही अपितु तो हृदयों का मिलन है तभी तो यह शारीरिक पूर्ति के अलावा मानसिक व भावनात्मक सुकून भी देता है। हम जिस परिवेश में रहते हैं, वहां शादी से पहले सेक्स को बुरा माना जाता है। हालांकि, आजकल  इस सोच में बदलाव आ रहा है। और इसी कारण समाज में बहुत सी नई परेशानियाँ भी प्रकट हो रही हैं। शादी के बाद ही सेक्स को ठीक कहा जा सकता है । क्योंकि यह वह क्रिया है जिसमें पल भर का सुख तो है लैकिन उस सुख की बेल पर लगा फल अगर लग गया तो जीवन भर के लिए दुःख भी दे सकता है।

अगर कोई ऐसा सोचता है कि सिर्फ पुरुष ही सेक्सुअल फैंटसीज का आनंद लेते हैं, तो आप गलत हैं। महिलाओं की भी सेक्सुअल फैंटसी होती है, भले ही वे अपने पार्टनर से शेयर ना करें। अगर आपकी पार्टनर सेक्स के दौरान किसी तरह की आवाज नहीं करती तो इसका मतलब यह नहीं कि वह सेक्स इंजॉय नहीं कर रही। सेक्स के दौरान कुछ महिलाएं वोकल होती हैं और कुछ शांति से इंजॉय करती हैं। हर बार अपनी सेक्स पार्टनर से आवाज की अपेक्षा करना गलत है। सेक्स के दौरान आप चरम आनंद (ऑर्गेज्म) महसूस नहीं करतीं तो आप अबनॉर्मल हैं...यह सोच 100 फीसदी गलत है। कई महिलाएं ऑर्गेज्म तक पहुंचती हैं पर वे खुद उसके बारे में नहीं जानतीं।

आप सोच रहे हैं कि आपका पहली बार सेक्स करने का एक्सपीरियंस माइंड ब्लोइंग होगा तो यह सही नहीं है। याद रखिए यह आपके लिए नया अनुभव है, इसलिए जरूरी है कि आप चीजों को आराम से करें। अक्सर कहा जाता है कि पहली बार सेक्स करने में बहुत दर्द होता है लेकिन अगर ठीक से फोरप्ले किया जाए और आप इसके लिए पूरी तरह तैयार हों तो पहली बार सेक्स करना बहुत आसान हो जाता है और बहुत कम दर्द होता है। हो सकता है आपको पहली बार बहुत अच्छा एक्सपीरियंस न हो लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि चीजें बेहतर होती जाएंगी। महिलाओं को फस्र्ट टाइम सेक्स के दौरान अपने पार्टनर को खुश करने के लिए ऑर्गेज्म का दिखावा करने की जरूरत नहीं है। धारणा है कि पहली बार सेक्स की अवधि बहुत लंबी होती है और इसका अंत ऑर्गेज्म के रूप में होता है। लेकिन यह धारणा सही नहीं है और ऑर्गेज्म के मामले में महिलाओं को निराशा हाथ लग सकती है। इसलिए जरूरी है कि पहली बार सेक्स के दौरान बिना किसी उम्मीद के सिर्फ इसे एंजॉय करने की कोशिश करें।

तिलक ---- किस अंगुली से किस अंगुली से किया जाना चाहिये?

हिन्दू धर्म में पूजा एक रूढ़ि नही है अपितु वास्तव में आयुर्वेद का ही एक अंग है जो हमारे शरीर को स्वस्थ रखने का एक मूल मंत्र है ।बस अंतर है तो इतना कि यह नही कहा गया है कि आप यह काम अपने स्वास्थ्य के लाभ के लिए कर रहे हैं अपितु वहाँ इन सब क्रिया विधियों को भगवान के साथ जोड़कर जरुरी कर दिया गया है जिससे कोई भी व्यक्ति ना नुकुर न करके अपने जीवन में उसे आवश्यक तत्व की तरह जोड़ ले।
आज इसी प्रकार की एक रीति को लेकर हम बात कर रहे हैं।
तिलक जो हमारी पूजा पद्धति का एक आवश्यक कर्म है और उसके लिए इतना तक कहा गया है कि बिना तिलक धारण किए कोई पूजा सफ़ल नहीं मानी जाती। ब्राह्मणों के लिए तो तिलक धारण करना अनिवार्य है। बिना तिलक किए हुए ब्राह्मण का मुख देखना भी अशुभ माना गया है। शास्त्रों में तिलक धारण के करने के नियम व मंत्र बताए गए हैं।
हिन्दू सनातन धर्म है जिसमें प्राचीन काल से ही तिलक लगाने की परंपरा हमारे ऋषि मुनियों ने अनेकों शोधों के उपरांत समाज को प्रदान की है
लेकिन किस अंगुली से किसे तिलक किया जाना चाहिए? यह जानना बहुत आवश्यक है।
   
मानव शरीर में ऊर्जा के सात सूक्ष्म केन्द्र हैं जिन्हैं आयुर्वेद व आध्यात्म चक्र कहता है उन्हीं में से एक चक्र वह स्थान है जहाँ हम तिलक लगाते हैं और इसका नाम है आज्ञा चक्र जिसे कोई कोई परंपरा गुरु चक्र के नाम से भी जानती बोलती है। इसी के एक ओर अजिमा व दूसरी ओर वर्णा नाम की नाड़ी है भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह आज्ञाचक्र बृहस्पति का केन्द्र है इसे देव गुरु का प्रतिनिधि माना जाता है।इसी कारण से इस चक्र को गुरु चक्र भी कहा जाता है। 
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 तिलक या टीका लगाने के लाभ ----

* हिन्दु धर्म में  मस्तक अर्थात आज्ञा चक्र पर तिलक लगाने को शुभ और सात्विकता का प्रतीक माना जाता है।  अतः  किसी कार्य की सफलता प्राप्ति के लिए रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुमकुम का तिलक लगाने से कार्य की सफलता का प्रतिशत बढ़ जाता है।

* यदि आप किसी भी नए कार्य के लिए जाते समय  काली हल्दी का टीका लगाकर जाना आपकी । यह टीका आपकी सफलता में मददगार साबित होगा। जो जातक तिलक के ऊपर चावल लगाता है लक्ष्मी उस जातक के आकर्षण में बंध जाती है और सदा उसके अंग-संग रहती हैं।

*  प्रतिदिन जो जातक चंदन का तिलक लगाते हैं उनका घर-आंगन अन्न-धन से भरा रहता है।

तिलक किस अंगुली से लगाऐ----

  1. तर्जनी अंगुली (Index Finger)- पितृगणों को तिलक देते समय अर्थात पिण्ड को तिलक देते समय दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुली का प्रयोग करें।
  2. मध्यमा अंगुली (Middle Finger) - दाहिने हाथ की अंगुली से स्वयं अपने तिलक लगाया जाता है।
  3. अनामिका अंगुली (Ring Finger) - दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली से भगवान व देवताओं को तिलक किया जाता है।
  4. अगूँठा (Thumb)- दाहिने हाथ के अँगूठे से अतिथियों को तिलक किया जाता है।
लैकिन किसी विशेष अभिलाषा के लिए अगर तिलक करना है तो विशेष अंगुली का प्रयोग किया जाता है।
  • प्रत्येक उंगली से तिलक लगाने का अपना-अपना महत्व है जैसे मोक्ष की इच्छा रखने वाले को अंगूठे से तिलक लगाना चाहिए
  • शत्रु नाश करना चाहते हैं तो तर्जनी से,
  •  धनवान बनने की इच्छा है तो मध्यमा से और सुख-शान्ति चाहते हैं तो अनामिका से तिलक लगाएं। 
  • देवताओं को मध्यमा उंगली से तिलक लगाया जाता है। 
उत्तर भारत में तिलक आरती के साथ आदर, सत्कार और स्वागत कर तिलक लगाया जाता है।

किन ग्रहों के प्रभाव से व्यक्ति एक सफल व्यवसायी बनता है जानिये ज्योतिष से

ज्योतिष -- जानिए कौन-कौन से ग्रह बनाते हैं आपको बिजनेस मैन?

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हर व्यक्ति हर काम नहीं कर सकता है। सबकी अलग-अलग कार्यक्षमता व मानसिक स्थिति होती है। उसी के अनुरूप अपना कार्यक्षेत्र चुनना चाहिए। कुछ लोगों को जॉब करना अच्छा लगता है तो कुछ को जॉब देना अच्छा लगता है। लोगों को आप जॉब तभी दे सकते जब आप बिजनेस करेंगे और बिजनेस में आप सफल तभी हो सकते है जब कुण्डली में बिजनेस से सम्बन्धित ग्रह, भाव व योग प्रबल हों।
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दशम भाव व दशमेश का सम्बन्ध आपकी जीविका से होता है। द्वितीय, द्वतीयेश व एकादश भाव, एकादेश का भी कुण्डली में मजबूत होना आवश्यक होता है। क्योंकि द्वतीय व द्वतीयेश का सम्बन्ध धन से होता है एंव एकादशेश व एकादश भाव का रिलेशन लाभ से होता है। व्यापार में धन व लाभ का विशेष महत्व है। धन नहीं होगा तो बिजनेस कर पाना मुश्किल है और धन अच्छे से नहीं आयेगा तो बिजनेस करने से फायदा क्या।
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यदि एकादश भाव व एकादशेश बलवान नहीं है तो व्यापार में लाभ नहीं होगा। वैसे मूलतः व्यापार के लिए बुध व बृहस्पति ग्रह का शुभ होना अच्छा माना जाता है लेकिन व्यापार किस चीज से सम्बन्धित है। इसके लिए प्रत्येक ग्रह की अलग-अलग क्षेत्र में विशेष भूमिका है।
🌺1-यदि आप राजनीति, चिकित्सा क्षेत्र, विद्युत विभाग, होटल मैनेजमेन्ट, रेलवे विभाग, आभूषण खरीदना-बेचना, रत्न बेचना, विद्युत उपकरण, मेडिकल स्टोर, जनरल स्टोर, कपड़े का कार्य, वाहनों का क्रय-विक्रय, पुस्तक भण्डार, अनाजों का खरीदना-बेचना आदि प्रकार के व्यवसाय करने के लिए जन्मपत्री में सूर्य ग्रह शुभ व बलवान आवश्यक है।
🌺2-यदि आप बागवानी का कार्य, कृषि कार्य, तरल पदार्थो का व्यापार, आयुर्वेदिक दवाओं का व्यापार, बिजली की दुकान, मोटर पार्टस पेट्रोल पम्प, कोल्ड्र डिंक, पानी, संगीत एकाडिमी, होटल, रेस्टोरेन्ट, मिटटी का कार्य, ठेकेदारी, किसी भी क्षेत्र में दलाली, कैरोािन आयल, प्रकाशसन,दूध की डेरी आदि व्यवसाय करना चाहते है तो कुण्डली में चन्द्रमा का बलवान होना बहुत जरूरी है।
🌺3-अगर आप कम्यूटर के क्षेत्र में साफ्टर, हार्डवेयर, इलेक्ट्रानिक, भूमि, मेडिकल, पेट्रोल पम्प, सर्जरी का सामान, कोर्ट-कचहरी, ठेकेदारी, मेडिकल की दुकान, धर्म उपदेशक, औषधि निर्माण कारखाना, आदि किसी प्रकार का बिजनेस करना चाहते है तो उसके लिए मंगल ग्रह का मजबूत होना जरूरी है और साथ में मंगल का दशम, दशमेश व लाभ भाव से सम्बन्ध होना आवश्यक है।
🌺- पर्यटन, टेलीफोन, तम्बाकू, पान मसाला, कत्था, किमाम, पुस्तक के थोक विक्रेता, दूर संचार विभाग की ठेकेदारी, रेलवे के पार्टो का कारखाना, चूडि़यों का व्यापार, कपड़े का व्यापार, हरी वस्तुओं का व्यापार, मार्केटिंग का बिजनेस तथा फर्नीचर आदि का व्यवसाय आपके लिए लाभप्रद रहेगा। इसके लिए बुध ग्रह का शुभ व ताकतवर होना बहुत जरूरी है तभी आप सफल हो पायेंगे।
🌺5-यदि आप सम्पादन कार्य, थोक विक्रेता, पूजन भण्डार, पान की दुकान, मिठाई की दुकान, इत्र का कार्य, फिल्म मेकर, भूमि का क्रय व विक्रय, आभूषण के विक्रेता, पीली वस्तुओं का व्यापार, वक्ता, नेता, शिक्षा और शेयर आदि का व्यवसाय करना चाहते है तो गुरू ग्रह का कुण्डली में मजबूत होना जरूरी है।
🌺6- अगर आप रेस्टोरेन्ट, सौन्दर्य प्रसाधन, शिल्प कार्य, साहित्य, फिल्म विज्ञापन, परिवहन विभाग की ठेकेदारी, वस्त्रों का व्यापार, हीरे का बिजनेस, सफेद वस्तुओं का कार्य, खनिज कार्य, पेन्टिंग, निर्माण कार्य, परिवहन विभाग, पर्यटन विभाग, रेसलिंग, टीवी शो, थियेटर, आदि से सम्बन्धित व्यवसाय करने के लिए शुक्र ग्रह का शुभ व बलवान आवश्यक होता है।
🌺7-यदि आप, ज्योतिष का कार्य, कर्मकाण्ड, लोहे का, वकालत, खनिज विभाग, तकनीकी कार्य, कृषि कार्य, काली वस्तुओं का व्यापार जैसे- तिलहन, काले तिल आदि, ट्रांसपोर्ट का कार्य, मुर्गी पालन, लकड़ी का कार्य, बिजली का कार्य, लोहे का कार्य, शिल्प कला का कार्य, कृषि कार्य, वाहन की ऐजेन्सी, मोटर पाटर््स आदि के व्यवसाय करने के लिए शनि का शुभ और ताकतवर होना अति-आवश्यक है।
🌺
नोट-ग्रहों के बलवान होने के साथ-साथ ग्रह किसी पाप भाव में पड़ा न हो, पाप ग्रहों से दृष्ट न हो, अस्त न हो, निर्बल न हो, नीच का न हो। द्वतीयेश, द्वतीय भाव, लाभ भाव, लाभेश, दशमेश व दशम भाव के साथ ग्रह सम्बन्ध होकर शुभ योग का निर्माण कर रहा हो तभी आप एक सफल बिजनेस मैन बन सकते है। आचार्य अश्विन कुमार इंद्रवादन व्यास श्री रंग कृपा ज्योतिष -वास्तु केंद्र कि मुलाक़ात लीजीयो 

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